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Explainer: तिरुपति मॉडल को क्यों बताया जा रहा राम मंदिर चंदा चोरी का हल, यहां कैसे रखते हैं हर पाई का हिसाब?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 22 Jun 2026 10:20 AM IST

सार

श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने राम मंदिर में दान से जुड़े विवादों को दूर करने के लिए अब तिरुमला में स्थित तिरुपति मंदिर के मॉडल के आधार पर राम मंदिर के लिए चढ़ावे की व्यवस्था का विचार सामने रखा है। आइये जानते हैं कि यह तिरुपति मंदिर मॉडल क्या है, जिसके प्रशासन को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है।
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राम मंदिर के लिए तिरुपति मंदिर जैसा प्रशासनिक मॉडल लागू करने पर चर्चा। - फोटो : Amar Ujala/AI
अयोध्या का राम मंदिर इन दिनों में देशभर में चर्चा में बना हुआ है। मुद्दा मंदिर के अंदर से चढ़ावे में आई नकदी और जेवरात की चोरी का है। इस पूरे मामले में मंदिर के निर्माण और संपत्ति के रखरखाव के लिए जिम्मेदार राम मंदिर ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों की भूमिका भी शक के घेरे में है। इसके अलावा चढ़ावे की गिनती के लिए लगाए गए कर्मचारियों की जांच जारी है। राज्य सरकार की तरफ से गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने इस मामले में हर एक कड़ी को जोड़ना शुरू कर दिया है। इस बीच श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने राम मंदिर में दान से जुड़े विवादों को दूर करने के लिए अब तिरुमला में स्थित तिरुपति मंदिर के मॉडल के आधार पर राम मंदिर के लिए चढ़ावे की व्यवस्था का विचार सामने रखा है। 

आइये जानते हैं कि राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े नृपेंद्र मिश्र ने राम मंदिर दान विवाद के बीच तिरुमला तिरुपति के दान मॉडल को लेकर क्या कहा? यह मॉडल क्या है, जो कि बीते कई वर्षों से भारत के सबसे ज्यादा दान पाने वाले मंदिर में राशि की गणना के लिए लागू है? यह कैसे अस्तित्व में आया और इसकी पारदर्शिता का उदाहरण क्यों दिया जाता है? क्या यह व्यवस्था पूरी तरह अचूक है?

 
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राम मंदिर के लिए तिरुपति मंदिर जैसा प्रशासनिक मॉडल लागू करने पर चर्चा। - फोटो : Amar Ujala/AI
अयोध्या का राम मंदिर इन दिनों में देशभर में चर्चा में बना हुआ है। मुद्दा मंदिर के अंदर से चढ़ावे में आई नकदी और जेवरात की चोरी का है। इस पूरे मामले में मंदिर के निर्माण और संपत्ति के रखरखाव के लिए जिम्मेदार राम मंदिर ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों की भूमिका भी शक के घेरे में है। इसके अलावा चढ़ावे की गिनती के लिए लगाए गए कर्मचारियों की जांच जारी है। राज्य सरकार की तरफ से गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने इस मामले में हर एक कड़ी को जोड़ना शुरू कर दिया है। इस बीच श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने राम मंदिर में दान से जुड़े विवादों को दूर करने के लिए अब तिरुमला में स्थित तिरुपति मंदिर के मॉडल के आधार पर राम मंदिर के लिए चढ़ावे की व्यवस्था का विचार सामने रखा है। 

आइये जानते हैं कि राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े नृपेंद्र मिश्र ने राम मंदिर दान विवाद के बीच तिरुमला तिरुपति के दान मॉडल को लेकर क्या कहा? यह मॉडल क्या है, जो कि बीते कई वर्षों से भारत के सबसे ज्यादा दान पाने वाले मंदिर में राशि की गणना के लिए लागू है? यह कैसे अस्तित्व में आया और इसकी पारदर्शिता का उदाहरण क्यों दिया जाता है? क्या यह व्यवस्था पूरी तरह अचूक है?
 

राम मंदिर दान विवाद के बीच तिरुमला तिरुपति के दान मॉडल को लेकर क्या कहा गया?

राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने मंदिर प्रबंधन में सुधार के लिए तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) मॉडल को अपनाने का सुझाव दिया है। उन्होंने तिरुपति मॉडल की तर्ज पर राम मंदिर के प्रबंधन के लिए एक स्वतंत्र कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति का सुझाव दिया है। 

नृपेंद्र मिश्र ने एक इंटरव्यू में बताया कि तिरुपति में कमिश्नर-रैंक का एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नियुक्त होता है, जो कि आईएएस स्तर का प्रशासनिक अधिकारी होता है। यह सीईओ आमतौर पर पांच से सात साल तक वहां रहकर पूरा कामकाज संभालता है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर के लिए नियुक्त होने वाले सीईओ के पास उत्तर प्रदेश में काम करने का अनुभव होना चाहिए, ताकि वह अयोध्या और राज्य की व्यवस्था को ठीक से समझ सके।

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मिश्र ने कहा कि भक्तों द्वारा दिए गए दान की एक-एक पाई का हिसाब पारदर्शी होना चाहिए और हर दिन के दान की गिनती अगले ही दिन की जानी चाहिए, ताकि लोग उसे देख सकें। तिरुपति देवस्थानम अपने बड़े वित्तीय प्रबंधन के लिए जाना जाता है, जहां हाल ही में 11 महीनों के भीतर 918.6 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड दान प्राप्त हुआ था।

यह तिरुमला तिरुपति मंदिर कहां है?

तिरुमला तिरुपति आंध्र प्रदेश में स्थित है। यह मंदिर शेषाचलम पर्वत श्रृंखला की सातवीं चोटी वेंकटाद्रि पर बसा हुआ है। यह एक पहाड़ी शहर है जो समुद्र तल से लगभग एक किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है और दस वर्ग मील से ज्यादा के जंगल के इलाके में फैला हुआ है। शेषाचलम की इन सात चोटियों को नाग आदिशेष के फनों का प्रतीक माना जाता है, जिसके कारण श्रद्धालु अक्सर इसे सात पहाड़ियों का मंदिर के नाम से भी पुकारते हैं।  

तिरुपति के पीठासीन देवता भगवान श्री वेंकटेश्वर, भगवान विष्णु का एक रूप हैं, जिन्हें कलियुग के दौरान मानवता को कठिनाइयों से उबारने के लिए पृथ्वी पर अवतरित माना जाता है; इसलिए श्रद्धालु अक्सर उन्हें कलियुग प्रत्यक्ष दैवम यानी 'इस युग का साक्षात भगवान' कहते हैं।

हर दिन कितने श्रद्धालु करते हैं दर्शन, इनके लिए कितने कर्मचारी तैनात?

सामान्य दिनों में मुख्य मंदिर में हर दिन लगभग 70,000 से 80,000 श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। त्योहारों या खास अवसरों के दिन दर्शनार्थियों की यह संख्या बढ़कर एक लाख पार कर जाती है। अगर पूरे वर्ष की बात करें तो दुनियाभर से लगभग 2.5 करोड़ श्रद्धालु भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन के लिए तिरुपति पहुंचते हैं।

इतनी जबरदस्त भीड़ के प्रबंधन, दर्शन व्यवस्था और मुख्य श्री वेंकटेश्वर मंदिर के साथ-साथ 11 अन्य मंदिरों के प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए टीटीडी में लगभग 14,000 कर्मचारी काम करते हैं। कर्मचारियों का यह भारी दल और पेशेवर प्रशासनिक ढांचा ही इतने बड़े पैमाने पर प्रतिदिन आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ और मंदिर की व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

तिरुपति मंदिर का इतिहास क्या, कैसे प्रशासन लगातार बढ़ा-बदला?

तिरुपति मंदिर पर नियंत्रण का इतिहास काफी हद तक दक्खन क्षेत्र पर नियंत्रण के राजनीतिक इतिहास से जुड़ा है। इसके प्रशासन में समय-समय पर बड़े बदलाव हुए हैं...

हिंदू राजाओं से लेकर ब्रिटिश काल तक: शुरुआत में मंदिर हिंदू राजाओं के नियंत्रण में था, जिसके पतन के बाद कर्नाटक के मुस्लिम शासकों ने इस क्षेत्र पर कब्जा किया और अंततः यह मंदिर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक हाथों में चला गया।

हाथीरामजी मठ को हस्तांतरण (1843): ईस्ट इंडिया कंपनी के लंदन स्थित 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' को हिंदू धार्मिक रीति-रिवाजों में कंपनी के अधिकारियों का शामिल होना ठीक नहीं लगा। इसलिए 1843 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस मंदिर और इसकी संपत्तियों का सारा नियंत्रण हाथीरामजी मठ के श्री सेवा दासजी को सौंप दिया।

महंतों का शासन (1843 - 1933): लगभग एक सदी तक मंदिर का सारा प्रशासन मठ के महंतों ने ही चलाया।

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मद्रास विधानमंडल का हस्तक्षेप (1933): 1933 में मद्रास विधानमंडल ने महसूस किया कि धार्मिक प्रशासन का कार्य बहुत अहम है और इसे केवल वंशानुगत पुजारियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए एक विशेष कानून बनाया गया और सरकार की तरफ से नियुक्त कमिश्नर के नेतृत्व में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) समिति का गठन किया गया।

बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की स्थापना (1951-1966): 1951 में यह ढांचा बदलकर एक बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज कर दिया गया। 1953 में जब आंध्र प्रदेश राज्य बना, तो शुरुआत में 1951 के मद्रास कानून को ही जारी रखा गया। लेकिन 1966 में आंध्र प्रदेश ने अपना हिंदू धार्मिक संस्थान और बंदोबस्ती अधिनियम पारित किया। इसके तहत 11 सदस्यीय ट्रस्टी बोर्ड और एक हिंदू कार्यकारी अधिकारी (ईओ) का पद बनाया गया।

स्वतंत्र टीटीडी कानून (1979 और 1987): 1970 के दशक के अंत तक मंदिर के संसाधन और दान में भारी बढ़ोतरी हो चुकी थी, जिससे पुराने नियमों के तहत फैसले लेने में देरी हो रही थी। इतने बड़े संस्थान के लिए यह व्यवस्था अपर्याप्त थी। आखिरकार 1979 में एक स्वतंत्र कानून लाया गया, जिसे बाद में 1987 के 'टीटीडी अधिनियम' के तौर पर और मजबूत किया गया। यही कानून आज भी मंदिर के प्रशासन का संचालन करता है।

मौजूदा प्रशासनिक ढांचा (टीटीडी मॉडल): आज तिरुमला तिरुपति देवस्थानम कोई निजी ट्रस्ट नहीं है, बल्कि आंध्र प्रदेश सरकार का एक वैधानिक निकाय है जो सीधे राज्य के प्रति जवाबदेह है। 

इसका प्रशासनिक ढांचा स्पष्ट रूप से दो स्तरों में बंटा है

1. ट्रस्ट बोर्ड (नीतियां बनाने वाली इकाई): राज्य सरकार की ओर से नियुक्त इस बोर्ड में राजनीतिक, न्यायिक, धार्मिक और व्यावसायिक क्षेत्रों के सदस्य होते हैं, जो मंदिर की व्यापक नीतियां तय करते हैं। 

2. कार्यकारी अधिकारी (दैनिक प्रशासन देखने वाली इकाई): मंदिर का रोजमर्रा का कामकाज एक कमिश्नर-रैंक के सेवारत आईएएस अधिकारी द्वारा संभाला जाता है, जिसे एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (ईओ) कहते हैं। वह वित्त, सुरक्षा और तीर्थयात्रियों के कल्याण की देखरेख करता है और ट्रस्ट बोर्ड के सदस्य-सचिव के रूप में भी कार्य करता है। 

इस तरह, यह प्रणाली नीतियां बनाने वाले बोर्ड और उन्हें लागू करने वाले पेशेवर प्रशासक (सीईओ/ईओ) के बीच शक्तियों और जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा सुनिश्चित करती है।

टीटीडी को अभी कौन चला रहा है?

वर्तमान में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम का संचालन मुख्य रूप से दो प्रमुख अधिकारियों के नेतृत्व में किया जा रहा है। इनमें ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष मीडिया उद्यमी बीआर. नायडू हैं। यह बोर्ड मंदिर से जुड़ी व्यापक नीतियां तय करता है। वहीं, मंदिर का दिन-प्रतिदिन का कामकाज देखने के लिए  1996-बैच के आईएएस अधिकारी मुड्डादा रविचंद्र को कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया है। उन्होंने फरवरी 2026 में अपना पद संभाला। इनके अलावा, दैनिक प्रशासन और ऑनलाइन दान जैसी सुविधाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए अतिरिक्त कार्यकारी अधिकारी सीएच. वेंकैया चौधरी भी अपना योगदान दे रहे हैं। 


तिरुमला तिरुपति मंदिर में दान की क्या व्यवस्था, पारदर्शिता कितनी?

तिरुमला तिरुपति देवस्थानम दुनिया का सबसे धनी हिंदू मंदिर ट्रस्ट बताया जाता है। यहां दान के प्रबंधन की एक जबरदस्त बड़ी, अच्छे ढंग से व्यवस्थित और पारदर्शी व्यवस्था है।
 

दैनिक और वार्षिक नकद दान (हुंडी) 

मंदिर की दान पेटी, जिन्हें हुंडी भी कहा जाता है, में हर दिन औसतन 3.6 करोड़ से 4.1 करोड़ रुपये का चढ़ावा आता है। इस तरह हर साल यह राशि लगभग 1,300 करोड़ से 1,600 करोड़ रुपये के बीच पहुंच जाती है।

सोने का दान और कुल जमा संपत्ति 

नकद के अलावा मंदिर को हर साल लगभग 1,400 किलोग्राम सोना भी दान के तौर पर मिलता है। अक्तूबर 2025 तक के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, टीटीडी के पास फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) के रूप में लगभग 14,000 करोड़ रुपये की नकदी और स्वर्ण मुद्रीकरण योजना के तहत लगभग 20 टन सोना बैंकों में जमा है।


ऑनलाइन और डिजिटल दान को बढ़ावा 

दान की प्रक्रिया को और बेहतर बनाने के लिए टीटीडी ने पूरे तिरुमला में डोनेशन कियोस्क स्थापित किए हैं। इसका असर यह हुआ है कि 2025 में इतिहास में पहली बार मंदिर के ऑनलाइन दान ने नकद दान को पीछे छोड़ दिया। एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 11 महीनों के भीतर 579.38 करोड़ रुपये ऑनलाइन दान के जरिए आए, जबकि इसी अवधि में नकद से 339.2 करोड़ रुपये का दान मिला।

दैनिक गिनती और पारदर्शिता

तिरुपति दान व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत इसकी जबरदस्त पारदर्शिता है। मंदिर में आने वाले दान की पाई-पाई का हिसाब रखा जाता है और हर दिन प्राप्त होने वाले दान की गिनती अगले ही दिन की जाती है। इस हिसाब को पूरी तरह से पारदर्शी रखते हुए जनता के सामने प्रदर्शित किया जाता है। 


 

अलग कार्यों के लिए अलग-अलग ट्रस्ट

मंदिर के दान का इस्तेमाल अलग-अलग सामाजिक और धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता है, जिसके लिए तिरुमला तिरुपति देवस्थान बोर्ड ने कई ट्रस्ट बनाए हैं। नवंबर 2024 से अक्तूबर 2025 के 11 महीनों में इन ट्रस्टों को रिकॉर्ड 918.6 करोड़ रुपये का दान मिला। दानकर्ताओं का पैसा प्रमुख ट्रस्टों में जाता है।

भक्तों के भोज के लिए: श्री वेंकटेश्वर नित्य अन्नप्रसादम ट्रस्ट भक्तों को मुफ्त भोजन कराने के लिए तय किया गया है। इसे अकेले 338.8 करोड़ रुपये का दान मिला।

स्वास्थ्य के लिए: श्री बालाजी आरोग्य वरप्रसादिनी योजना और एसवी प्राणदानम ट्रस्ट को लोगों की चिकित्सा सहायता के लिए तय किया गया है।

शिक्षा और गो-रक्षा के लिए: एसवी विद्या दान ट्रस्ट, वेद परिरक्षण ट्रस्ट और एसवी गोसंरक्षण ट्रस्ट शिक्षा और गो-रक्षा के अलावा गो-सेवा के लिए तय हैं।

क्या तिरुपति मंदिर की यह व्यवस्था पूरी तरह अचूक है?

तिरुपति मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था बेहतरीन होने के बावजूद पूरी तरह से अचूक नहीं कही जाती। दरअसल, कागजों पर एक कार्यकारी अधिकारी ईओ का कार्यकाल पांच से सात साल का होता है, लेकिन अक्सर अधिकारियों का कार्यकाल निश्चित नियमों के बजाय राज्य की राजनीतिक स्थितियों पर निर्भर हो जाता है। कई बार इस पद पर बहुत जल्दी-जल्दी बदलाव देखे गए हैं। उदाहरण के लिए, हाल ही में टीटीडी में एक साल के भीतर ही तीन अलग-अलग कार्यकारी अधिकारी बदले गए हैं।

नौकरशाही की व्यवस्था चाहे कितनी भी अच्छी तरह से डिजाइन की गई हो, वह ऐसे बड़े और अहम संस्थान को राजनीतिक उथल-पुथल से पूरी तरह नहीं बचा सकती। हाल ही में हुए 'लड्डू विवाद' (घी-मिलावट विवाद) के दौरान जिस तरह से बीच तूफान में ही अधिकारियों का तबादला किया गया, वह इसका स्पष्ट उदाहरण बना है।
 

फिर इस मॉडल की वकालत क्यों की जा रही है?

इन कमियों के बावजूद, इस व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता यह है कि यह नीतियां तय करने वालों (ट्रस्ट बोर्ड) और उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने वाले पेशेवर प्रशासक के बीच एक वास्तविक और स्पष्ट बंटवारा सुनिश्चित करती है। इस व्यवस्था में रोजमर्रा के प्रशासन और जवाबदेही के लिए एक अधिकारी मौजूद रहता है और विशेषज्ञों का मानना है कि राम मंदिर ट्रस्ट के वर्तमान ढांचे में इसी स्पष्ट बंटवारे की कमी है।
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