फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भाजपा सरकार के नए श्रम कानून से किसको फायदा?

विज्ञापन
न्यूनतम आय बिल - फोटो : YouTube
विज्ञापन

"समाज के वो सभी वर्ग जो अबतक न्यूनतम मजदूरी के दायरे से बाहर थे, विशेषकर असंगठित क्षेत्र। चाहे वो खेतिहर मजदूर हों, ठेला चलाने वाले हों, सर पर बोझा उठाने वाले हों, घरों पर सफाई या पुताई का काम करने वाले हों, ढाबों में काम करने वाले हों, घरों में काम करने वाली औरतें हों, या चौकीदार हों। समस्त कार्यबल को नया श्रम कानून बनने के बाद न्यूनतम मजदूरी का अधिकार मिल जाएगा।"

विज्ञापन


श्रम और रोजगार मामलों के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संतोष कुमार गंगवार ने ये बात उस वक्त कही, जब मंगलवार को संसद के नीचले सदन लोक सभा में 'वेजेज कोड बिल' पास किया जा रहा था। सरकार का कहना है कि इस बिल से हर मजदूर को न्यूनतम वेतन मिलना सुनिश्चित होगा। इसके अलावा वेतन के भुगतान में देरी की शिकायतें भी दूर होंगी।

सरकार का कहना है कि ये बिल ऐतिहासिक है और बेहद पुराने हो चुके कई कानूनों की जगह लेने जा रहा है। गंगवार के मुताबिक इस बिल से पचास करोड़ श्रमिकों को फायदा मिलेगा। संगठित क्षेत्र के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को भी इसका फायदा मिलेगा। उनका कहना है कि अबतक 60 प्रतिशत श्रमिक पुराने कानून के दायरे में नहीं थे।
विज्ञापन


ध्वनि मत से पास किए गए इस बिल में - मिनिमम वेजेज एक्ट, पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट, पेमेंट ऑफ बोनस एक्ट और इक्वल रैम्यूनरेशन एक्ट सम्मिलित कर दिया गया है। लेकिन कई श्रम संगठन नए बिल का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये बिल श्रमिकों के नहीं, बल्कि उनके मालिकों के हित में है। वो इसे भाजपा की कॉरपोरेट सेक्टर को फायदा पहुंचाने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं।

इस बिल के खिलाफ दो अगस्त यानी शुक्रवार को देशभर की ट्रेड यूनियन और सेंट्रल यूनियन विरोध प्रदर्शन कर रही है। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की जनरल सेकेट्री अमरजीत कौर और न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव के जनरल सेकेट्री गौतम मोदी ने कहा कि भाजपा सरकार श्रम कानून को बदलने की कोशिश कर रही है और ट्रेड यूनियन की मांग है कि बिल को वापस लिया जाए।

दरअसल 32 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार कोड्स में समाहित किया जा रहा है। इसी के अंतर्गत कोड ऑफ वेजेज है जिसमें मेहनताने से जुड़े चार एक्ट समाहित हो रहे हैं।

श्रम और रोजगार मामलों के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संतोष कुमार गंगवार ने कहा, "कई बार लोगों को उनका वेतन और मेहनताना महीने के अंत में नहीं मिलता, कई बार तो दो-तीन तक नहीं मिलता। परिवार परेशान होता है। सभी को न्यूनतम मजदूरी मिले और वो मजदूरी वक्त पर मिले, ये हमारी सरकार की जिम्मेदारी है, जिसे हम इस बिल के जरिए सुनिश्चित कर रहे है। मासिक वेतन वालों को अगले महीने की सात तारीख, साप्ताहिक आधार पर काम करने वाले को सप्ताह के अंतिम दिन और दिहाड़ी करने वालों को उसी दिन वेतन मिले, ये इस बिल में प्रावधान है।"

केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने परिक्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी की दरें तय करती हैं। अलग-अलग राज्यों में श्रमिकों का मेहनताना अलग-अलग है। लेकिन नए बिल में प्रावधान है कि एक फ्लोर वेज तय किया जाएगा, जिससे कम मेहनताना कहीं नहीं दिया जा सकेगा।

'सरकार पावर अपने हाथ में लेना चाहती है'

लेकिन न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव के जनरल सेकेट्री गौतम मोदी कहा कहना है, "आज तक जो कानून के दायरे में है, ये सरकार उसे खींचकर अपने दायरे में ला रही है। खासतौर से न्यूनतम वेतन के मुद्दे में सरकार पूरा पावर अपने हाथ में लेना चाह रही है। वो एक राष्ट्रीय वेतन तय करना चाह रही है और जो राष्ट्रीय वेतन उसने करने का कहा है - 178 रुपए। वो काफी कम है।"

वहीं ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की जनरल सेकेट्री अमरजीत कौर का कहना है कि "178 रुपए प्रति दिन के हिसाब से तो न्यूनतम वेतन 4628 मिलेगा। लेकिन हम ट्रेड यूनियन की मांग है कि न्यूनतम वेतन 18,000 हो। लेकिन सरकार इसे एक चौथाई पर लेकर आ रही है। हमारी मांगे मानने के बजाए वो नेशनल मिनिमम वेज फिक्स करने की कोशिश कर रहे हैं।"

हालांकि सरकार का कहना है कि फ्लोर वेज त्रिपक्षीय वार्ता के जरिए तय किया जाएगा। लोक सभा में गंगवार ने बताया कि श्रम मंत्रालय में कोई भी परिवर्तन करने के लिए सभी बड़े श्रमिक संगठन, नियोक्ताओं और राज्य सरकारों से पहले चर्चा करनी पड़ती है, ये होती है त्रिपक्षीय वार्ता। इसके बाद आम राय के साथ ही कोई भी परिवर्तन करना संभव होता है।

उन्होंने बताया कि इस कोड पर भी त्रिपक्षीय वार्ता हुई थी, साथ ही इस वेज कोड का ड्राफ्ट 21 मार्च 2015 से 20 अप्रैल 2015 तक मंत्रालय की वेबसाइट पर पब्लिक डोमेन में डाला गया था। जिससे आम लोगों के सुझावों को भी बिल में शामिल किया गया है।

पिछली लोक सभा में भी 10 अगस्त 2017 को तत्कालीन श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रय ने इस बिल को सदन में पेश किया था। जिसके बाद इसे किरिट सौमैया की अध्यक्षता वाली स्टेंडिग कमिटी के पास भेज दिया गया और 18 दिसंबर 2018 को कमिटी ने इसपर अपनी रिपोर्ट दी। सरकार के मुताबिक कमिटी के 24 में से 17 सुझावों को मान लिया गया।

लेकिन अमरजीत कौर का आरोप है कि सरकार ने कोडिफिकेशन की प्रक्रिया में त्रिपक्षीय वार्ता को तरजीह नहीं दी। उनका कहना है कि जिन कोड पर थोड़ी बहुत बात हुई भी थी, उनपर भी उनके किसी पक्ष को स्वीकार नहीं किया गया।

वहीं गौतम मोदी कहते हैं कि "सरकार की कोशिश है कि मालिक जो सुविधा मांग रहे हैं वो सुविधा उन्हें दी जा रही है। मजदूरों का आज हक है कि वो अपनी ट्रेड यूनियन के माध्यम से शिकायत कर सकते हैं, लेकिन अब उसे रद्द किया जा रहा है। भाजपा सरकार ये सब मालिक के हित में कर रही है। ये ना सिर्फ श्रमिकों के हित के खिलाफ है, बल्कि ये उनपर हमले की तरह है।"

ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडिशन कोड

अमरजीत कौर कहती हैं- ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ कोड को तो अभी वेब पेज पर डाला था, अभी तो शुरुआती स्तर पर चर्चा हो रही थी। अभी तो चर्चा भी आगे नहीं बढ़ी है। वेज कोड के जरिए ये वेज को केलकुलेट करने का क्राइटेरिया बदल रहे हैं।

15वीं इंडियन लेबर कांफ्रेंस में क्राइटेरिया सेट किया गया था, उसे नजरअंदाज किया गया है। सुप्रीम कोर्ट में पूर्व में एक मामले आया था। जिसमें मांग थी कि इंडियन लेबर कांफ्रेंस ने जो क्राइटेरिया फिक्स किया था, उसमें 25 फीसदी और जुड़ना चाहिए, ताकि वो परिवार की शिक्षा और दूसरी जरूरतों को पूरा कर सकें।

उसी के आधार पर सातवें वेतन आयोग ने 18000 रु वेतन केलकुलेट किया था। सेंट्रल ट्रेड यूनियन ने 26,000 रु मांगा था। फिर उस कमिटी ने 21,000 रु तक मान लिया था। लेकिन भारत सरकार ने 18,000 रु घोषित कर नोटिफिकेशन निकाल दिया।

सेंट्रल सरकार के कर्मचारियों का, जो कॉन्ट्रेक्ट या आउटसोर्स वर्कर हैं, उसके लिए 18,000 रुपये घोषित है। और देश की सभी वर्कफोर्स के लिए हमने 18,000 रुपये मांगा, तो उसको 5000 रुपये से नीचे लाया जा रहा है।

सरकार की ये दोहरी नीति तो है ही और वर्कफोर्स को बाहर फेंकने का तरीका भी है। इसी के साथ जो इस वेज कोड के अंदर फिक्स टर्म इंप्लायमेंट आ गया है, इससे तो वेज कभी फिक्स ही नहीं हो पाएगी। क्योंकि आपने कह दिया कि आप पांच घंटे के लिए काम लें, कि दस घंटे के लिए, कि पांच दिन के लिए कि 10 दिन के लिए। उतने दिन का कॉन्ट्रेक्ट होगा तो वेतन केलकुलेट कैसे होगा।

ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ को लेकर तेरह कानून थे, उसे मिलाकर एक जगह ला दिया गया। साथ में कह दिया है कि जिसके 10 कर्मचारी होंगे उसपर ही लागू होगा। इसका मतलब हुआ कि 93 प्रतिशत वर्कफोर्स इसके बाहर है। वो लोग दिहाड़ी मजदूर, कांट्रेक्ट वर्कर है।

सरकार को चाहिए था कि वो छूटे हुए श्रमिकों के लिए कानून लाए। लेकिन अब ऐसा कर दिया कि जो कवर में थे उनके लिए दिक्कत हो जाएगी और जो अनकवर थे वो तो अनकवर ही रहेंगे। झूठ बोला जा रहा है कि सभी को सेफ्टी और सिक्योरिटी मिल जाएगी।

श्रमिकों का स्वास्थ्य खतरे पर आने वाला है, क्योंकि आप बीड़ी उद्योग के मजदूर, पत्थर तोड़ने वाले मजदूर, सीवर में उतरने वाले मजदूर, एटोमिक एनर्जी या न्यूक्लियर प्लांट में काम करने वाले मजदूर, खदान में काम करने वाले मजदूर या बिजली प्रोडक्शन में काम करने वाले श्रमिक की तुलना नहीं कर सकते।

सबकी कठनाईयां अलग-अलग हैं, उनकी बीमारियां, उनके इलाज अलग हैं। अब इन्होंने वर्क कंडीशन और वेलफेयर दोनों को अलग-अलग कर दिया, वो कोड बहुत डेमेजिंग हैं।

कोड ऑन इंडस्ट्रियल रिलेशन

आईआर कोड में तो हड़ताल का हक छीन लिया जाएगा। हड़ताल के पहले की जो गतिविधियां हैं, उनके ऊपर भी अंकुश लगाने की बात है। अगर 50 प्रतिशत लोग केजुअल लीव ले लेते हैं और लीव लेकर हड़ताल करते हैं तो वो कह रहे हैं कि हम उसे भी हड़ताल मानेंगे और कार्रवाई करेंगे।

अगर आप ग्रुप बनाकर ज्ञापन लेकर मैनेजमेंट के पास जाए, तो उसे भी व्यवधान माना जाएगा। उसकी भी इजाजत नहीं होगी। धरने की इजाजत नहीं होगी। ये लोग ट्रेड यूनियन का मुंह बंद करना चाहते हैं।

महिलाओं के लिए भी संशोधन गलत होने जा रहे हैं, जोखिम भरे उद्योगों में महिलाओं को काम करने की इजाजत दी जाएगी। फैक्ट्री और खदान में नाइट शिफ्ट तो पहले से ही कर दिया गया था, अब कोड में भी डाल रहे हैं।

साथ ही मौजूदा सोशल सिक्योरिटी के नॉर्म्स को खत्म करने की साजिश हो रही है। वित्त मंत्री ने कहा था कि इससे नियोक्ताओं को इनकम टैक्स फाइल करना आसान हो जाएगा। इसका मतलब वर्कर के लिए नहीं नियोक्ता के लिए है ये कोड। सरकार इन बिलों को मौजूद सत्र में संसद से पास कराने की कोशिश करेगी।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें