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राज्यसभा उपसभापति का चुनाव : मनोज झा और हरिवंश आमने-सामने, जानें चुनावी प्रक्रिया

Mon, 14 Sep 2020 09:34 AM IST
अनवर अंसारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Rajya sabha election - फोटो : Rajya sabha
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संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में आज उपसभापति पद के लिए चुनाव होने जा रहा है। सत्तापक्ष और विपक्ष ने अपने-अपने उम्मीदवार को मैदान में उतार दिया है। एनडीए की तरफ से जेडीयू के हरिवंश नारायण एक बार फिर उम्मीदवार बनाए गए हैं। वहीं, विपक्ष की ओर से आरजेडी के सांसद मनोज झा अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। दोनों ही नेता बिहार से आते हैं। 

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मनोज झा को किन पार्टियों का समर्थन मिला
आरजेडी के मनोज झा को उपसभापति पद के चुनाव में एक दर्जन से अधिक दलों को समर्थन मिलने की उम्मीद है। इसमें कांग्रेस 40, डीएमके 7, वामपंथी दल 6, आरजेडी 5, एनसीपी 4, शिवसेना 3, मुस्लिम लीग 1, जेडीएस 1, जेएमएम 1, केरल कांग्रेस 1 और टीडीपी के 1 राज्यसभा सदस्य का समर्थन शामिल हैं। वहीं, टीएमसी 13, समाजवादी पार्टी 8, पीडीपी 2 ,नेशनल कॉन्फ्रेंस 1 भी पक्ष में है। वहीं, मनोज झा की नजर उन दलों को अपने साथ करने पर है, जो एनडीए के घटक दल नहीं है, लेकिन जरूरत पड़ने पर वह इसके समर्थन में खड़ी रहते हैं। इसमें बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस है। झा की नजर बसपा 4 और आम आदमी पार्टी के 3 सांसदों पर भी है। 

हरिवंश को किसका मिला है समर्थन
राज्यसभा में भाजपा के पास 87 सदस्य हैं, जबकि एनडीए के सदस्यों की संख्या 116 है। इसमें भाजपा 87, एआईडीएमके 9, जेडीयू 5, अकाली दल 3, एजेपी 1, बीपीएफ 1, आरपीआई 1, एनपीएफ 1, एमएनएफ 1, एनपीपी के 1 और नामित सदस्य 7 को मिलाकर कुल 116 सदस्यों का समर्थन हासिल है। राज्यसभा के 245 सदस्यों के सदन में जीत के लिए हरिवंश नारायण को 123 वोट चाहिए। ऐसे में वह टीआरएस 7, वाईएसआर 6 और बीजेडी के 9 सदस्यों का समर्थन चाहेंगे। 

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उपसभापति चुनाव कैसे होता है

राज्यसभा का उपसभापति एक संवैधानिक पद है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 89 में कहा गया है कि राज्यसभा अपने एक सांसद को उपसभापति पद के लिए चुन सकता है, जब यह पद खाली हो। दरअसल, उपसभापति का पद इस्तीफा, पद से हटाए जाने या इस पद पर आसीन राज्यसभा सांसद का कार्यकाल खत्म होने के बाद रिक्त हो जाता है।

क्या है राज्यसभा के उपसभापति चुनने का नियम

कोई भी राज्यसभा सांसद इस संवैधानिक पद के लिए अपने किसी साथी सांसद के नाम का प्रस्ताव आगे बढ़ा सकता है। इस प्रस्ताव पर किसी दूसरे सांसद का समर्थन भी जरूरी है। इसके साथ ही प्रस्ताव को आगे बढ़ाने वाले सदस्य को सांसद द्वारा हस्ताक्षरित एक घोषणा प्रस्तुत करनी होती है जिनका नाम वह प्रस्तावित कर रहा है। इसमें इस बात का उल्लेख रहता है कि निवार्चित होने पर वह उपसभापति के रूप में सेवा करने के लिए तैयार हैं। प्रत्येक सांसद को केवल एक प्रस्ताव को आगे बढ़ाने या उसके समर्थन की अनुमति है। अगर किसी प्रस्ताव में एक से ज्यादा सांसद का नाम हैं तो इस स्थिति में सदन का बहुमत तय करेगा कि कौन राज्यसभा के उपसभापति के लिए चुना जाएगा। अगर सभी राजनीतिक दलों में किसी एक सांसद के नाम को लेकर आम सहमति बन जाती है, तो इस स्थिति में सांसद को सर्वसम्मति से राज्यसभा का उपसभापति चुन लिया जाएगा।
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क्या है उपसभापति की भूमिका

भारत में संसद के दो सदन होते हैं, एक लोकसभा और दूसरा राज्यसभा। लोकसभा के सदस्यों को जनता मतदान करके चुनती है जबकि राज्यसभा के सदस्यों को राज्यों के चुने गए विधायक निर्वाचित करते हैं।

राज्यसभा की अध्यक्षता देश के उपराष्ट्रपति करते हैं। अभी वेंकैया नायडू उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के अध्यक्ष हैं। अध्यक्ष ही सभापति होते हैं और एक उपसभापति भी होते हैं, जिसे राज्यसभा के सदस्य मिलकर चुनते हैं। अध्यक्ष के ना होने पर उपासभापति राज्यसभा का कार्यभार संभालते हैं।

अध्यक्ष या उपाध्यक्ष जो भी सदन की अध्यक्षता करता है, उसका काम नियमों के हिसाब से सदन को चलाना होता है। किसी भी बिल को पास कराने के लिए वोटिंग हो रही है तो उसकी देखरेख भी ये ही करते हैं। ये किसी भी राजनीतिक पार्टी का पक्ष नहीं ले सकते हैं।

सदन में हंगामा होने या किसी भी वजह से सदन को स्थगित करने का अधिकार अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को ही होता है। किसी सदस्य के इस्तीफा को मंजूर या नामंजूर करने का अधिकार अध्यक्ष का उपाध्यक्ष को ही होता है।
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