Rajouri Terror Attack: जम्मू-कश्मीर में भले ही केंद्र सरकार यह दावा करे कि राज्य में आतंकवादी घटनाओं में भारी कमी आ रही है। आतंकियों की नई भर्ती पर काफी हद तक रोक लगाने में सफलता मिली है। इन सबके बीच जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद, अब एक नए फेमेलियर चेहरे के साथ पांव जमाने का प्रयास कर रहा है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, आईएसआई पहले भी आतंकियों की प्रमुख मददगार थी, आज भी है। 'खेल तो अभी शुरू हुआ है', 'कश्मीर में आतंकवाद की नई स्वदेशी लहर की शुरुआत', और 'अदृश्य आतंकी संगठन' जैसे नए प्रयोग प्रारंभ हो गए हैं। गोली चलाने से पहले दहशतगर्द यह पता लगाते हैं कि सामने हिंदू है या मुसलमान है। वह स्थानीय नागरिक है या बाहरी है। ये सब तरीके, सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी एवं गंभीर चुनौती बन गए हैं। नए चेहरे के आतंक की अहम कड़ी ओवर ग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू) हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि राजौरी के डांगरी गांव में आतंकियों ने जिस तरह तीन हिंदुओं को मारा गया है और दस लोगों को घायल किया है, उसके मद्देनजर जम्मू कश्मीर में आतंकवाद को खत्म करने के करीब पहुंचने के दावे बेमानी हैं।
प्रतिबंधों से बचने के लिए पाकिस्तान का नया पैंतरा
जम्मू-कश्मीर के सुरक्षा संबंधी मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) कहते हैं, डांगरी गांव की घटना हैरान करने वाली नहीं है। कश्मीर घाटी और जम्मू क्षेत्र में आतंकवाद एक नए रूप रंग में पनप रहा है। आतंकियों को नया चेहरा प्रदान किया गया है। तीन साल पहले पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों ने अपने पुराने आतंकी संगठनों को पर्दे के पीछे छिपाने और खुद को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की कार्रवाई से बचाने के लिए जम्मू-कश्मीर में कई छोटे आतंकी संगठन खड़े किए थे। इनमें सबसे अहम संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) है। इसके अलावा द ज्वाइंट कश्मीर फ्रंट (जेकेएफ), द पीपुल्स एंटी फासिस्ट फोर्स (पीएएफएफ), कश्मीर गजनवी फोर्स (केजीएफ), एयूजीएच और अल-बदर जैसे कई आतंकी संगठन सामने आ गए। खास बात है कि ये सब भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को अच्छे से मालूम है। यही वजह है कि टीआरएफ की आतंकी गतिविधियों को उसके आका, यानी पाकिस्तानी आतंकी संगठन 'लश्कर-ए-तैयबा' के खाते में जोड़ा जाता है। जैसे 2022 में जम्मू-कश्मीर में 115 एनकाउंटर हुए थे। इनमें 180 आतंकी मारे गए। आतंकियों में 50 विदेशी (पाकिस्तानी) आतंकी थे, जब लोकल आतंकियों की संख्या 130 रही है। मारे गए आतंकियों में से अधिकांश 'लश्कर-ए-तैयबा' के सदस्य थे। इस सूची में दूसरा नंबर 'जैश-ए-मोहम्मद' आतंकी संगठन का रहा है।
ओवर ग्राउंड वर्कर्स के जरिए गच्चा देने का प्रयास
जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ सुरक्षा बलों के ऑपरेशनों पर निगरानी रख रहे एक अधिकारी बताते हैं, यह बात सही है कि आतंक अब अपना चेहरा बदल रहा है। आपको ध्यान होगा कि घाटी में पहले सीधा हमला होता था। स्थानीय या पाकिस्तानी मूल के आतंकी, हमले को अंजाम देते थे। घाटी में 2016 के आसपास पत्थरबाजी का दौर शुरू हुआ। सरकार ने जब सख्ती बरती तो अब वैसी घटनाएं लगभग खत्म हो गई हैं। केस दर्ज करने से लेकर, नौकरी और काम धंधे तक, सरकार ने उनके हर मामले में जब बाधा खड़ी करनी शुरू की तो पत्थर फेंकने वाले युवा रास्ते पर आ गए। इसके बाद आतंकियों की भर्ती पर नकेल कसने का प्रयास हुआ। साल 2022 में 100 युवाओं ने आतंकी संगठन ज्वाइन किया। इनमें से 65 आतंकी, सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए। 17 गिरफ्तार कर लिए गए। यही वजह रही कि अब जम्मू कश्मीर में जो सक्रिय आतंकी बचे हैं, उनमें स्थानीय आतंकी कम और पाकिस्तानी मूल के ज्यादा आतंकी हैं। अभी 70 से ज्यादा पाकिस्तानी आतंकी, जम्मू-कश्मीर में छिपे हैं। पचास के करीब लोकल आतंकी हैं। यह बात दर्शाती है कि आतंकी संगठनों के सामने नई भर्ती का संकट खड़ा है। इन सबके चलते आतंकी संगठनों ने धर्म का मुद्दा, जबरदस्त तरीके से उछाला और खासतौर पर हिंदुओं को निशाना बनाया जाने लगा।
आरएसएस को लेकर उग्र हैं नए छद्म आतंकी संगठन
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद यह बात जोर-शोर से फैला दी गई कि अब वहां पर दूसरे राज्यों के लोग आकर बस जाएंगे। वे स्थानीय लोगों की प्रॉपर्टी खरीद लेंगे। बाहरी लोगों को डर दिखाया गया। नतीजा, करीब दो साल बाद भी यहां दर्जनभर बाहरी लोग, जमीन नहीं खरीद सके। यह बात भी फैलाई गई कि ये सब आरएसएस के इशारे पर हो रहा है। इस मुहिम में क्षेत्रीय दलों ने भी जलती आग में घी डाल दिया। माखन लाल बिंद्रू की हत्या के बाद आतंकी संगठन टीआरएफ ने कहा, बिंद्रू आरएसएस के हाथों में खेल रहे थे। सतपाल निछल को मारने के बाद कहा कि वे भी आरएसएस से जुड़े थे। प्रिंसिपल सुपिंदर कौर और अध्यापक दीपक चंद को जब मारा गया, तो उससे पहले स्कूल के स्टाफ को कहा गया था कि जो हिंदू हैं, वे इधर खड़े हो जाएं और जो मुस्लिम हैं, वो उधर खड़े हो जाएं। यह बात दर्शाती है कि आतंक को अब पूरी तरह से धर्म का रंग दिया जा रहा है। ओवर ग्राउंड/अंडर ग्राउंड वर्कर, के बलबूते अब पाकिस्तानी आतंकी संगठन दुनिया को यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद नहीं है। वहां तो लोकल लोगों को परेशान किया जा रहा है। वे लोग अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। पाकिस्तान, इस बात को अंतरराष्ट्रीय मंचों से खुद के लिए ढाल की तरह इस्तेमाल करता है। जम्मू-कश्मीर से आतंकवाद का सफाया करना है, तो सुरक्षा एजेंसियों को इस नए रंग रूप को खत्म करना होगा। यह किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। जम्मू और कश्मीर, दोनों क्षेत्रों में ओवर ग्राउंड/अंडर ग्राउंड वर्कर मौजूद हैं। इन्हें बाहर निकालना होगा।