मोदी और शाह को नहीं साध पाए
2013 के पहले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से उनका कोई बहुत गंभीर रिश्ता नहीं था। लेकिन समय के पारखी राजनाथ ने राजनीति में मोदी का तरीका देखा। राजस्थान के विधानसभा चुनाव, राज्यपाल कमला बेनीवाल के जयपुर में पारिवारिक समारोह समेत अन्य में राजनाथ को मोदी साफ उभरते दिखे। राजनाथ सिंह ने बड़ा फैसला लिया। वह नरेंद्र मोदी के साथ जाकर खड़े हो गए। राजनाथ का यह बड़ा ही कैलकुलेटेड निर्णय था। क्योंकि तब तक लालकृष्ण आडवाणी बनाम नरेंद्र मोदी की राजनीति सतह पर जगह बना चुकी थी। राजनाथ सिंह हर मोदी के साथ खड़े रहे। संसदीय बोर्ड की मीटिंग तक में डॉ. मुरली मनोहर जोशी वाराणसी की अपनी सीट से लड़ने के लिए अड़ते रहे और राजनाथ सिंह खामोश रहे।
सुषमा स्वराज ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने पर गहरी नाराजगी जताई। डिसेंट नोट लिखने तक को कहा। वरिष्ठ नेताओं को पछताने की चेतावनी तक दे दी, लेकिन राजनाथ सिंह खामोश रहकर नरेंद्र मोदी का रास्ता बनाते रहे। रास्ता बना भी। अमित शाह यूपी चुनाव अभियान के प्रभारी बन गए। नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए। चुनाव बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इच्छा का सम्मान करते हुए राजनाथ सिंह गृहमंत्री बन गए। प्रधानमंत्री के कैबिनेट में नेता नंबर दो।
....तो क्या राजनीति की आखिरी पारी खेल रहे हैं राजनाथ
भाजपा के दिग्गज नेता को अपने पुत्र पंकज सिंह को टिकट दिलवाने, उन्हें राजनीति में बनाए रखने के लिए मशक्कत करनी पड़ी थी। 2014 में पांच साल के लिए सत्ता के शीर्ष पर बैठने का अवसर खो चुके राजनाथ को अपनी स्थिति बचाए रखने के लिए काफी संयमित, शांत, समझौतावादी होना पड़ा। इससे उनकी छवि राजनीति में एक खामोश नेता की बन गई है। इस बार भी वह समय की चाल देखकर रक्षा मंत्री बनने के लिए राजी हो गए। कैबिनेट की आठ समितियों में से वह केवल दो समिति में रखे गए। अमित शाह सभी आठ में हैं। शुरुआत में राजनाथ सिंह जैसे नेता को कैबिनेट की संसदीय मामलों की समिति और राजनीतिक मामलों की समिति में भी नहीं रखा गया। नेता नंबर दो से वह नेता नंबर चार पर खिसकते गए। माना जा रहा है कि इस बार भी संघ ने पहले की तरह की उनके प्रतिष्ठा की रक्षा की। तब कहीं जाकर वह 24 घंटे के भीतर छह समितियों में स्थान पा सके हैं। वैसे देखा जाए तो इस बार के लोकसभा चुनाव और केंद्रीय मंत्रिमंडल से सुषमा स्वराज, उमा भारती, सुमित्रा महाजन समेत तमाम नेता बाहर हैं। अटल-आडवाणी युग का चेहरा न के बराबर है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी और शाह नए युग की तरफ बढ़ते हुए स्थापित होने जा रहे हैं।