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Rajiv Gandhi Assassination: राजीव गांधी के हत्यारों को किस नियम की वजह से मिली रिहाई, 31 साल में कब क्या हुआ?

Fri, 11 Nov 2022 04:06 PM IST
हिमांशु मिश्रा स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

आइए जानते हैं कि कोर्ट ने जिस अनुच्छेद 142 के तहत आरोपियों को रिहा किया वो क्या है? राजीव गांधी की हत्या से लेकर अब तक इस मामले में क्या-क्या हुआ? आखिर कोर्ट ने क्यों इन दोषियों को रिहा कर दिया? राज्य सरकार ने किस नियम के तहत दोषियों की रिहाई की मांग की थी?  
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राजीव गांधी की हत्या का मामला। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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 सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या में शामिल छह दोषियों की रिहाई का आदेश दिया है। इसके साथ ही इस मामले के सभी सात दोषी रिहा हो गए हैं। इसी साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य दोषी एजी पेरारिवलन को आर्टिकल 142 का हवाला देते हुए रिहा किया था। 
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न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि जिस नियम के तहत एजी पेरारिवलन को रिहाई दी गई थी, वो इस मामले में दोषी पाए गए अन्य पर भी लागू होती है। ये सभी आरोपी करीब 31 साल से जेल में बंद थे। बता दें कि राजीव गांधी की हत्या 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में आत्मघाती बम धमाके में हुई थी। 

आइए जानते हैं कि कोर्ट ने जिस अनुच्छेद 142 के तहत आरोपियों को रिहा किया वो क्या है? राजीव गांधी की हत्या से लेकर अब तक इस मामले में क्या-क्या हुआ? आखिर कोर्ट ने क्यों इन दोषियों को रिहा कर दिया? राज्य सरकार ने किस नियम के तहत दोषियों की रिहाई की मांग की थी?  
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पहले जान लीजिए पूरा मामला 
21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में चुनावी रैली के दौरान एक महिला आत्मघाती हमलावर ने खुद को विस्फोट से उड़ा लिया था। इसमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी मारे गए थे। महिला की पहचान धनु के तौर पर हुई थी। पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को आरोपी बनाया था, जिनमें पेरारिवलन, मुरुगन, संथन, रविचंद्रन, रॉबर्ट पायस, जयकुमार और नलिनी श्रीहरन शामिल थे। 

1998 में टाडा अदालत ने पेरारिवलन, मुरुगन, संथन और नलिनी को मौत की सजा सुनाई थी। राहत नहीं मिलने के बाद पेरारिवलन और अन्य दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। साल 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने सजा को बरकरार रखा। 2014 में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया। 
2008 में जब जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री थीं, तो उन्होंने कैबिनेट से सातों दोषियों की रिहाई के लिए प्रस्ताव पास किया। जिसे राज्यपाल को भेजा गया था। राज्यपाल ने उसे राष्ट्रपति के पास भेजा। तब से ये मामला लंबित था। 2018 में फिर से तमिलनाडु सरकार ने दोषियों की रिहाई के लिए प्रस्ताव पास करके राज्यपाल के पास भेजा था।  

इस बीच दोषी पेरारिवलन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसी साल मई में पेरारिवलन की याचिका पर सुनवाई करते हुए अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए रिहा कर दिया। इसके बाद अन्य छह दोषियों ने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। जिसपर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने शुक्रवार को पेरारिवलन के मामले में दिए गए फैसले को अन्य सभी दोषियों पर लागू करने का आदेश दिया। 
 

कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?  
पेरारिवलन के मामले में न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने अनुच्छेद-142 के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया था। पेरारिवलन को रिहा करने का आदेश देते हुए कोर्ट ने कहा था, 'राज्य मंत्रिमंडल ने प्रासंगिक विचार-विमर्श के आधार पर रिहाई का फैसला किया था। अनुच्छेद-142 का इस्तेमाल करते हुए, दोषी को रिहा किया जाना उचित होगा।' 

इसके पहले 10 मई को सुनवाई करते हुए भी कोर्ट ने राज्यपाल की ओर से दया याचिका का निस्तारण न करने पर टिप्पणी की थी। कहा था, 'प्रथम दृष्टया राज्यपाल का यह फैसला गलत और संविधान के खिलाफ है क्योंकि वह राज्य मंत्रिमंडल की सिफारिश से बंधे हैं। उनका फैसला संविधान के संघीय ढांचे पर प्रहार करता है।' 
 

क्या है अनुच्छेद-142 जिसके तहत हुई दोषियों की रिहाई? 
संविधान में सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद-142 के तौर पर एक विशेष शक्ति प्रदान की गई है। इसके तहत न्याय के लिए कोर्ट जरूरी निर्देश दे सकता है। अनुच्छेद-142 के मुताबिक जब तक किसी अन्य कानून को लागू नहीं किया जाता तब तक सुप्रीम कोर्ट का आदेश सर्वोपरि होगा। इसके तरह कोर्ट ऐसे फैसले दे सकता है जो लंबित पड़े किसी भी मामले को पूर्ण करने के लिए जरूरी हों। कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश तब तक लागू रहेंगे जब तक कि इससे संबंधित प्रावधान को लागू नहीं कर दिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता चंद्रप्रकाश पांडेय कहते हैं, 'अनुच्छेद-142 के तहत कहा गया है कि किसी मामले में भले ही कोई कानून न बना हो, लेकिन पूर्ण न्याय की परिभाषा के तहत शीर्ष अदालत कोई आदेश पारित कर सकता है।' 
 

जब दोषियों को उम्रकैद की सजा मिली तो रिहाई कैसे हो सकती है? 
दरअसल, कोई भी कैदी राज्य सरकार की निगरानी में होता है। ऐसे में राज्य सरकार देखती है कि किस कैदी का कैसा आचरण है। उम्रकैद की सजा पाने वाले कैदियों को कम से कम 14 साल जेल में रहना ही पड़ता है। हां, इसके बाद ये सजा 16 साल, 30 साल या ताउम्र भी हो सकती है। लेकिन, 14 साल के बाद अगर राज्य सरकार सजा खत्म करने अपील करती है तो उसकी सुनी जाती है। इस मामले में भी यही हुआ।

 राजीव गांधी के हत्या के दोषी सातों मुजरिम 31 साल से जेल में बंद थे। ऐसे में सजा की एक लंबी अवधि पूरी हो चुकी है। राज्य सरकार ने अनुच्छेद-161 के तहत इन दोषियों की रिहाई के लिए प्रस्ताव पास किया था। इस अनुच्छेद के अनुसार, राज्य के राज्यपाल के पास किसी ऐसे मामले से संबंधित किसी भी कानून के खिलाफ किसी भी अपराध के लिये दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को माफ करने, राहत देने या निलंबित करने, हटाने या कम करने की शक्ति होती है। इसके लिए राज्य सरकार की तरफ से राज्यपाल को प्रस्ताव भेजा जाता है। राज्य सरकार के प्रस्ताव को मानने के लिए राज्यपाल बाध्यकारी होता है।
 
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कब-कब हुआ अनुच्छेद-142 का प्रयोग? 
  • 2019 : अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मामले में फैसला देते हुए कोर्ट ने अनुच्छेद-142 का इस्तेमाल किया था। तब कोर्ट ने इस अनुच्छेद का प्रयोग करते हुए मस्जिद बनाने के लिए भी अलग से जमीन के आवंटन का आदेश पारित किया था।
  • 2021 : एक दलित छात्र को आईआईटी बॉम्बे में एडमिशन दिलाने के लिए कोर्ट ने इस अनुच्छेद का प्रयोग किया। 
  • 2022 : पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारे पेरारिवलन को छोड़ने के लिए कोर्ट ने मई 2022 में अनुच्छेद-142 का इस्तेमाल किया। अब इसी मामले के अन्य छह दोषियों को भी इसी अनुच्छेद के तहत रिहा कर दिया गया।
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