राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के एक बयान पर फिर विवाद खड़ा हो गया है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान हरियाणा में उन्होंने कहा था कि 'यह देश पुजारियों का नहीं, तपस्वियों का है। भाजपा-आरएसएस लोगों को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य करते हैं'। उनके इस बयान से देशभर के पुजारी उनके खिलाफ हो गए हैं और हरिद्वार से लेकर प्रयागराज तक के पुजारी उनके विरुद्ध बयान देकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। पुजारियों की यह नाराजगी राजनीतिक रंग पकड़ती दिख रही है। भाजपा ने इस पर राहुल गांधी पर हमला बोला है।
दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा बार-बार धार्मिक मुद्दों को उठा रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को जब प्रवासी भारतीय सम्मेलन के बीच प्रवासी मेहमानों से महाकाल के मंदिर का दर्शन अवश्य करने की बात कही, तो इसे बेवजह नहीं माना जा रहा है। इसके पहले अमित शाह ने लोगों को याद कराया कि अगले साल की शुरुआत में राम मंदिर तैयार हो जाएगा। उन्होंने लोगों से मंदिर दर्शन के लिए अभी से अपना टिकट बुक करा लेने की बात भी कही। भाजपा के इन शीर्ष नेताओं के बयानों से ही स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में एक बार फिर हिंदुत्व का मुद्दा उठाने की कोशिश करेगी।
कांग्रेस भी भाजपा की इस रणनीति को समझ रही है। यही कारण है कि राहुल गांधी अपनी यात्रा के दौरान लगातार हिंदू मंदिरों का दर्शन कर और हिंदू धर्माचार्यों से आशीर्वाद ले रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा के दूसरे चरण की शुरुआत भी उन्होंने दिल्ली के सिद्ध माने जाने वाले मरघट वाले हनुमान जी के दर्शन के साथ किया। इसे कांग्रेस की हिंदू मतदाताओं तक एक संदेश पहुंचाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
क्यों हुआ विवाद?
राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा एक रणनीति के तहत धार्मिक मुद्दों को दोबारा उठाने की कोशिश कर रही है। राममंदिर का निर्माण अगले साल की जनवरी में पूरा होना है और उसी साल के अप्रैल-मई माह में चुनाव होंगे। जाहिर है कि भाजपा इसका लाभ उठाने की कोशिश करेगी। इसके लिए वह स्वयं को ज्यादा हिंदू समर्थक बताने की कोशिश करेगी तो कांग्रेस और राहुल गांधी को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करेगी। राहुल गांधी के बयान पर शुरू हुआ विवाद इसी कोशिश की एक कड़ी हो सकता है।
संजय कुमार ने कहा कि इसके पहले भी राहुल गांधी 'हिंदुत्व और हिंदू धर्म' को अलग-अलग बता चुके हैं। ये दोनों एक दूसरे से कितने अलग हैं, यह अलग बहस का विषय हो सकता है, लेकिन भाजपा उनके इन्हीं बयानों के सहारे उन्हें हिंदुओं के हितों और भावनाओं का ध्यान न रखने वाला साबित करने की कोशिश करती है। कांग्रेस के कुछ नेताओं के हिंदू धर्म को लेकर दिए जा रहे बयान भी उसे यह अवसर उपलब्ध करा देते हैं।
उन्होंने कहा कि राजनीति में मुद्दे उठाने से ज्यादा उन्हें जनता तक पहुंचाना महत्त्वपूर्ण होता है। राहुल के साथ-साथ कांग्रेस नेताओं को यदि इन मुद्दों का लाभ उठाना है, तो उन्हें अपने मुद्दों-बयानों को ज्यादा बेहतर तरीके से निचले स्तर तक पहुंचाने की रणनीति तैयार करनी चाहिए। इसके अभाव में बयान का लाभ मिलने की बजाय नुकसान होने की संभावना रहती है।
लेकिन जिस तरह राहुल गांधी के बयानों पर चौतरफा हमले हो रहे हैं, उससे कम से कम यह संकेत अवश्य जाता है कि भारत जोड़ो यात्रा अपना असर दिखा रही है। इसका एक वर्ग पर असर हो रहा है। कांग्रेस को इसका लाभ मिल सकता है। नीतीश कुमार और शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेताओं के बयान जिस तरह अचानक कांग्रेस को लेकर सकारात्मक हो रहे हैं, उससे एक साझेदारी की संभावना बनती दिखाई पड़ रही है। यही कारण है कि अब ऐसे राजनीतिक हमलों के बढ़ने की भी संभावना है।