भाजपा के कई सांसदों को लग रहा है कि प्रधानमंत्री कांग्रेस अध्यक्ष के दबाव में आ गए हैं। वह अपनी जनसभाओं में राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते नजर आ रहे हैं। लखनऊ में उनकी गरीबी में जनता का भागीदार होने का बयान भी पार्टी के नेता इसी नजरिए से देख रहे हैं। 2009 के चुनाव में भाजपा के लिए अहम भूमिका निभाने वाले एक नेता का सुझाव है कि भाजपा को इस समय वरिष्ठ नेताओं को अग्रिम मोर्चे पर लगाना चाहिए। इन नेताओं की जनता में एक छवि भी है और क्या कहना है, क्या नहीं समझते हैं। सूत्र का कहना है कि यदि 2019 में सत्ता में लौटना है तो ऐसा करना पड़ेगा। लेकिन सूत्र की सबसे बड़ी समस्या है कि पार्टी के फोरम पर या सरकार के न तो कोई उन्हें सुनेगा और न ही वह बोलना भी चाहते हैं।
राफेल डील से डर
भाजपा के नेताओं को राफेल डील का डर सताने लगा है। हालांकि उन्हें भरोसा है कि प्रधानमंत्री की जनता के बीच में लोकप्रियता बनी है, लेकिन यदि यह मुद्दा 2019 के लोकसभा चुनाव तक रह गया तो परेशानी बढ़ा देगा। पार्टी के एक केन्द्रीय मंत्री को पहले अनुमान था कि यह थोड़े दिन में समाप्त हो जाएगा। पहले वह सोच रहे थे कि गुजरात चुनाव के बाद समाप्त बो जाएगा। लेकिन अब उन्हें भी लग रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष की इस टीम इसे 2019 तक मुद्दा बनाने पर काम कर रही है।
मोदी से अच्छा नेता नहीं
भाजपा के नेता, सरकार के मंत्री कुछ मुद्दों को लेकर भले थोड़ा तंग चल रहे हैं, लेकिन जिन लोगों से बात हुई सबकी एक सुर में राय प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में है। सबका कहना है कि अभी भी प्रधानमंत्री देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। प्रधानमंत्री की जनता में साख बनी है और लोग उनके साथ जुड़े हैं। कभी लालकृष्ण आडवाणी के करीबी रहे सूत्र के मुताबिक आज भी प्रधानमंत्री मोदी के मुकाबले न तो भाजपा में और न ही भारतीय राजनीति में कोई चेहरा है। प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष के बारे में भाजपा के नेताओं की यह राय भी काफी गजब की है। सबका मानना है कि वह दोनों पिछले कई दशक में भारतीय राजनीति को मिले सबसे ज्यादा सक्रिय नेताओं में से है। पार्टी के नेताओं को प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष की चुनाव प्रचार और जनता से कनेक्ट होने की तकनीक पर पूरा भरोसा है।