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कानों देखी: सज रही है राहुल गांधी की नई टीम 

Fri, 08 Jun 2018 08:49 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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टीम राहुल नये अंदाज में सज-संवर रही है। नया खाका बन रहा है। मिल रही जानकारी के मुताबिक टीम राहुल और टीम सोनिया में तालमेल बनाने, कामकाज को स्मूथ करने की पहल तेजी से हो रही है। इसके लिए राहुल गांधी के सचिवालय को उनके आवास तुगलक लेन से दस जनपथ लाया जा रहा है।
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दस जनपथ पार्टी के मुख्यालय 24 अकबर रोड से भी सटा है। बात यहीं खत्म नहीं हो रही है। कांग्रेस अध्यक्ष अंकल विंसेंट जॉर्ज की मदद चाहते हैं। अंकल जॉर्ज कभी पिता राजीव गांधी और मां सोनिया गांधी के काफी करीबी थे। लगभग 15-16 साल पहले 10 जनपथ से उनका पत्ता कट गया था। लेकिन अंकल राजनीति और सचिवालय के कामकाज को काफी समझते हैं। गुरुग्राम में रहते हैं।

इन दिनों उनकी राहुल गांधी से बातचीत बढ़ गई है। दस जनपथ का आना जाना बढ़ गया है। खबर है कि जॉर्ज अंकल, पीवी माधवन, एसवी पिल्लई, पुलक चटर्जी, सुमन दुबे, किशोरी लाल शर्मा और प्रियंका, सोनिया का विश्वास हासिल कर चुके धीरज श्रीवास्तव अब यूपीए चेयरपर्सन के साथ-साथ राहुल गांधी के लिए भी काम करेंगे। इनके साथ-साथ राहुल गांधी की टीम के कौशल विद्यार्थी, कनिष्क सिंह, केवीबी वाइजू और अलंकार सवाई बड़ी टीम से तालमेल बनाकर कांग्रेस अध्यक्ष के सचिवालय को नई चमक देंगे।
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टीम गडकरी की बल्ले-बल्ले

हंसमुख मिजाज के परिवहन मंत्री अपने बिंदास अंदाज के लिए जाने जाते हैं। सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के मास्टर तो हैं ही, ऊपर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दुलारे भी हैं।

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे हो या मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह चौहान, उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ सब गडकरी के प्रबंधन की तारीफ करते नहीं थकते। इन दिनों अपने गडकरी भाई का कोई जवाब नहीं है। नागपुर से लेकर दिल्ली तक उनका सिक्का चल रहा है। हो भी क्यों न।

मोदी सरकार के एकलौते जोरदार परफार्मिंग मिनिस्टर जो ठहरे। उनके विभाग के एक संयुक्त सचिव की मानें तो अगले साल तक भूतल परिवहन मंत्रालय ही ऐसा है जो प्रधानमंत्री से सबसे ज्यादा फीते कटवाएगा। ऐसे में जो पीएमओ पहले कभी गडकरी से जुड़े हर मामले में बड़ा फूंक-फूंककर चल रहा था, अब उसकी भी चूलें ढीली पड़ गई है।

इतना ही नहीं उनकी भारी भरकम टीम के भी अच्छे दिन आ गए हैं। हालत तो यहां तक पहुंच गई है कि तमाम भाजपाई और संघी अब नितिन गडकरी को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखने की इच्छा तक जाहिर करने लगे हैं।

भाजपा के अंगूर खट्टे

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इन दिनों कड़वे चने चबाने पड़ रहे हैं। हालत यह है कि नीतीश कुमार से मोदी-शाह की नई भाजपा न तो उगली जा रही है और न ही निगली। कोई चाहे तो उनके करीबी केसी त्यागी से ही पूछ ले।

त्यागी का कहना है कि पहले वाली भाजपा नहीं रही। हाल के उपचुनाव में मिली हार से भाजपा के लिए नीतीश कुमार के चेहरे कार्ड भी फीका पड़ने लगा है। माना जा रहा है कि भाजपा के संगठन मंत्री रामलाल के हाल में हुई मुलाकात के बाद से ही नीतीश कुमार को इसका आभास होने लगा है। वहीं राजद के तेजस्वी यादव अब लगातार चुटीले अंदाज में ट्वीट करने लगे हैं। कुल मिलाकर नीतीश की छवि पर बन आई है।

सूत्र बताते हैं कि नीतिश कुमार बिहार में लोकसभा चुनाव में ठीक-ठीक सीटें चाहते हैं, लेकिन भाजपा उन्हें बमुश्किल दहाई का आंकड़ा पार करा पाने का संकेत दे रही है। निश्चित रूप से नीतीश कुमार को भी तब निराशा हाथ लगी होगी, जब राम लाल भी अपने हाथ करते नजर आए। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी नीतीश कुमार की इस व्यथा पर कोई कान नहीं दे रहे हैं। शाह पहले से ही मन बनाकर बैठे हैं कि नीतीश कुमार के पास भजपा या राजद, कांग्रेस गठबंधन में से कम परेशान करने वाले का ही विकल्प बचा है।

वुसंधरा की धरा

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अबूझ पहेली बनी है। राजनीति की चतुर खिलाड़ी वसुंधरा ने केन्द्र सरकार के दो अपने करीबी मंत्रियों तथा एक भाजपा के मुख्यमंत्री के सहारे अपना सुरक्षा कवच साध रखा है।

नागपुर तक भी वसुंधरा की सीधी पकड़ है। लिहाजा वह अपने ठसक भरे महारानी वाले अंदाज में राजस्थान की सरकार और राजस्थान की भाजपा को चला रही है। वसुंधरा राजस्थान में किसी को हाथ नहीं रखने दे रही है। न ही सरकार के कामकाज पर और न ही भाजपा में संगठनात्मक बदलाव पर। लेकिन खबर है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह राजस्थान में सत्ता में वापसी के लिए नई रणनीति तैयार कर रहे हैं। वह जुलाई से नया पासा फेंक सकते हैं। यह रणनीति वसुंधरा के साथ फ्रेंडली सिस्टम को अपनाकर विरोधियों को मात देने की है।

शाह के करीबियों का मानना है कि राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में इस साल के अंत तक चुनाव प्रस्तावित हैं। इतने कम समय में टकराव का संदेश पार्टी का जनाधार कमजोर करेगा। वैसे भी राजस्थान स्विंग स्टेट हैं। वहां पांच साल के बाद सरकार बदल जाने का चलन है। इसलिए वसुंधरा के विरोधियों को भी समझाया जा रहा है कि वह दिल थामकर बैठे। चुनाव के बाद बनने वाले नये समीकरण में सबकुछ ठीक किया जाएगा।

भाई कुछ तो ख्याल रखो

शरद पवार राजनीति के धुरंधर मौसम विज्ञानी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दोस्तों में शुमार हैं, लेकिन धर्म निरपेक्षता की राजनीति करते हैं। इन दिनों पवार कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर राजनीति की पिच तैयार कर रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि 2019 में देश के राजनीति की तस्वीर बदलेगी। इतना ही नहीं महाराष्ट्र की भी तकदीर बदलेगी।

कांग्रेस और एनसीपी का मिलकर चुनाव लड़ना करीब-करीब तय है। हवा का रुख देखकर पवार ने अपनी पार्टी के नेताओं को कांग्रेस की दुखती रग पर हाथ रखने और तालमेल बनाकर चलने का संदेश दे दिया है, लेकिन कांग्रेसी अपने मिजाज से बाज ही नहीं आ रहे हैं।

बताते हैं इससे राजनीति के धुर खिलाड़ी पवार की उलझन बढ़ रही है। क्योंकि वह छोटी-छोटी बातों की चर्चा कांग्रेस के नेतृत्व से करके खुद का वजन घटाना नहीं चाहते। वैसे भी कांग्रेस पार्टी की महाराष्ट्र ईकाई में कोई विलास राव देशमुख जैसा तो है नहीं, लेकिन नेताओं की हेकड़ी है तो है।

ईरानी का दर्द

जीवन में जब कुछ अच्छा होना शुरू होता है, तो अचानक किस्मत मुझसे उसे छीन लेती है। कुछ ऐसी ही स्थिति केन्द्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी की है। कम समय में राजनीति की पुच्छल तारा बनी ईरानी की किस्मत 2014 में तब खुली जब उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय जैसा महकमा मिला। उससे बड़े भाग तब बने जब मोदी सरकार के कामकाज के एक साल पूरे होने का लेखा-जोखा तैयार करने की समिति में उन्हें अहम जिम्मेदारी मिल गई।

ईरानी ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय इतनी जल्द बाजी दिखाई कि वह पलक झपकते ही विवाद का केन्द्र बन गई। यहां तक कि मंत्रालय के अधिकारी भी काम करने में परेशानी महसूस करने लगे। किस्मत ने पलटा खाया और कपड़ा मंत्रालय का प्रभार मिल गया। कहें न कहें लेकिन ईरानी भी इसे अपना डिमोशन मानती रहीं। वहां भी मंत्रालय के सचिव से विवाद हुआ, लेकिन जल्दी ही फिर गाड़ी पटरी पर आ गई। वेंकैया नायडू के उपराष्ट्रपति बनने से उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का प्रभार मिल गया।

स्मृति ईरानी ने पूरे मंत्रालय में उथल-पुथल मचा दिया। इतना की सूचना विभाग के अफसर भी दंग रह गए। मंत्रालय में राज्यमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने भी अपने दूसरे विभाग युवा और खेल मंत्रालय को समय देना शुरू कर दिया, लेकिन फिर किस्मत ने पलटा खाया। अब वह केवल कपड़ा मंत्रालय की कबीना मंत्री हैं। ईरानी को समझ में नहीं आ रहा है कि वह तो परफार्म कर रही थी फिर उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है।
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प्रभु पर प्रभु की कृपा

सबसे प्रसन्न मंत्री सुरेश प्रभु। प्रभु पर मानो प्रभु की कृपा। मिलिए तो चेहरे पर पुराने सुरेश प्रभु का सुकून दिखाई देता है। ठीक वैसा जैसा वह वाजपेयी जी के मंत्रिमंडल में थे। छेड़ दीजिए तो मुस्कराकर जवाब भी दे देते हैं। कुल मिलाकर जीवन में शांति लौट आई है। कहें न कहें लेकिन रेल मंत्रालय बड़ा उनके लिए थकाऊ था। 15-16 घंटे काम।

यह कहने से वह नहीं चूकते कि वहां हमेशा तलवार लटकी रहती थी। अच्छा किया धरा भी पल पर भर में सिफर। अब जब से वाणिज्य मंत्रालय में आए हैं, समय से दफ्तर, घर और क्षेत्र के लोगों के लिए समय दे पा रहे हैं।

इतना ही नहीं लो प्रोफाइल रहकर हाई प्रोफाइल काम भी कर पा रहे हैं। वहीं रेल मंत्रालय है कि जैसा छोड़कर गए थे, उससे कुछ नहीं सुधरा है। ट्रेने लेट चल रही है। समस्याएं लगभग वैसी ही हैं। बस एक सुधार हुआ है। इधर रेल दुर्घटना की खबर कम आ रही है।
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