उल्लेखनीय है कि विपक्षी दल कांग्रेस ने इस सौदे की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने की मांग कर रही है। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी पूर्व संप्रग सरकार की तुलना में ऊंची कीमत पर राफेल विमान सौदे को लेकर राजग सरकार की लगातार आलोचना कर रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार ने अपने चहेते ‘उद्योगपति’ को लाभ पहुंचाने के लिये सौदे में फेरबदल किया है।’’
इन आरोपों के बारे में पूछे जाने पर कि अनिल अंबानी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नजदीकी के चलते ही रिलायंस डिफेंस को ठेका मिला है, जवाब में धींगड़ा ने कहा ‘‘रक्षा खरीद प्रक्रिया के तहत विदेशी कंपनियों द्वारा अपने भारतीय भागीदार के चयन में रक्षा मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं है। यह स्थिति 2005 से है जब देश में ‘आफसेट’ नीति पेश की गयी।
उन्होंने कहा कि अब तक देश में 50 से अधिक आफसेट (निर्यात दायित्व) अनुबंध पर दस्तखत किये गये, सभी में वही प्रक्रिया अपनायी गयी। ‘‘इसलिए यह लोगों को गुमराह करने के लिये जानबूझकर इस तरह की बातें की जा रहीं हैं।’’
देश की आफसेट नीति के तहत किसी भी देश से जब कोई बड़ा रक्षा सौदा किया जाता है तो उसमें यह शर्त रखी जाती है कि कुल आयात का एक निश्चित प्रतिशत भारत में तैयार करना होगा, इसके लिये भारत में निवेश होगा अथवा कलपुर्जो, जरूरी सामान की खरीदारी भारत में करनी होगी।
रिलायंस डिफेंस का लड़ाकू विमान बनाने के क्षेत्र में कोई अनुभव नहीं होने के बारे में धींगड़ा ने कहा कि कि एचएएल को छोड़कर किसी भी कंपनी के पास लड़ाकू विमान बनाने का अनुभव नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘इसका मतलब यह हुआ कि हमारे पास जो क्षमता मौजूद है केवल वहीं रहेगी और हम कोई नई क्षमता सृजित नहीं कर सकते हैं। इसका परिणाम यह होगा कि देश रक्षा हार्डवेयर के लिये 70 प्रतिशत से अधिक आयात पर निर्भर बना रहेगा।’’
धींगड़ा ने इन आरोपों को पूरी तरह गलत बताया कि रिलायंस को 30,000 करोड़ रुपये अनुबंध का लाभ होगा। उन्होंने कहा कि आफसेट दायित्व में डेसाल्ट की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत है जबकि शेष आफसेट दायित्व थेल्य, सेफ्रान, एमबीडीए और अन्य से जुड़ी हैं।
धींगड़ा ने कहा कि इस सौदे में आफसेट कार्यक्रम में रिलायंस की भागीदारी डासाल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड के जरिये होगी। इस उपक्रम में डसाल्ट के पास 49 प्रतिशत हिस्सेदारी होगी। डसाल्ट के पास एयरोस्पेस विनिर्माण के क्षेत्र में 90 वर्ष का लंबा अनुभव है। इस लिहाज से यह संयुक्त उद्यम कंपनी सबसे कुशल और सक्षम विनिर्माता कंपनी होगी।