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राफेल विवाद: 18 साल पहले वायुसेना ने मांगे थे लड़ाकू विमान, फिर 12 साल तक ऐसे फंसा रहा पेंच

Fri, 07 Dec 2018 05:46 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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राफेल विमान (सांकेतिक चित्र)
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आज देश में शायद ही ऐसा कोई शख्स होगा जो राफेल विवाद से परिचित नहीं होगा। इस मुद्दे पर कांग्रेस लगातार मोदी सरकार पर हमलावर रही है।उसका आरोप है कि इस सौदे में कई तरह की गड़बड़ियां हुई हैं। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी पर घोटाले का आरोप लगाया है। हालांकि हर बार मोदी सरकार इसपर अपना जवाब भी देती रही है।फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है।आइए जानते हैं क्या है यह विवाद और कब शुरू हुआ था यह मामला? 

फ्रांस से 36 लड़ाकू विमानों की खरीदी का हुआ है करार 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल 2015 में घोषणा की थी कि भारत फ्रांसीसी विमान निर्माता कंपनी से 36 राफेल लड़ाकू विमानों को खरीदेगा। इसके बाद सितंबर 2016 में भारत ने 7.87 बिलियन यूरो (करीब 58,000 करोड़ रुपये) में 36 नए राफले लड़ाकू जेट खरीदने के लिए फ्रांसीसी सरकार के साथ सीधा सौदा किया। राफेल को 2012 में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और रूस से प्रतिद्वंद्वी प्रस्तावों पर चुना गया था। मूल योजना यह थी कि भारत फ्रांस से 18 ऑफ द शेल्फ जेट खरीदेगा। मोदी सरकार ने पिछली यूपीए सरकार की 126 राफेल खरीदने की प्रतिबद्धता से पीछे हटकर कहा कि डबल इंजन वाले विमान बहुत महंगे होंगे और यह समझौता भारत और फ्रांस के बीच लगभग एक दशक लंबी वार्ता के बाद हुआ।  

ये हैं विवाद की प्रमुख वजहें 

दरअसल, साल 2000 में वायुसेना ने लड़ाकू विमानों की खरीदी का प्रस्ताव तत्कालीन एनडीए सरकार को दिया था। तब वायुसेना के पास लड़ाकू स्क्वाड्रंस (विमानों के समूह) की क्षमता महज 34 ही थी और उसे कम से कम 42 स्क्वाड्रंस की जरूरत थी। चूंकि उसके बाद एनडीए की सरकार चली गई और यूपीए की सरकार आई, जिसके बाद साल 2007 में यूपीए सरकार ने वायुसेना की जरूरतों को देखते हुए 126 लड़ाकू विमानों को खरीदने की प्रक्रिया शुरू की और साल 2008 में विमानों की खरीद के लिए टेंडर जारी कर दिए गए। इस प्रक्रिया में दुनियाभर की कुल 6 कंपनियों ने भाग लिया, जिसमें सबसे निचली बोली राफेल बनाने वाली डैसो एविएशन ने लगाई और टेंडर उसे दे दिया गया। 

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इसके बाद दिसंबर 2012 में टेंडर प्रकिया पूरी होने के बाद तय हुआ कि कंपनी पहले 18 राफेल तैयार अवस्था में देगी, जबकि 108 विमान भारत में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ मिलकर बनाए जाएंगे, लेकिन कुछ अन्य शर्तों पर कंपनी के साथ सहमति नहीं बन सकी और सौदा रद्द हो गया। 

इन चीजों पर नहीं बनी सहमति 

दरअसल, डैसो एविएशन के साथ जिन चीजों पर सहमति नहीं बनी, उनमें सबसे प्रमुख था तकनीकी ट्रांसफर। इसके अलावा डैसो एविएशन भारत में बनने वाले राफेल विमानों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को भी तैयार नहीं थी। हालांकि फिर भी इस मुद्दे पर दो साल खींचतान हुई, लेकिन फिर भी सहमति नहीं बन सकी। 

मोदी सरकार के आने के बाद फिर खुल मामला 

साल 2014 में यूपीए की सरकार चली गई और भाजपा की सरकार सत्ता में आ गई, जिसके बाद साल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस से 36 लड़ाकू विमानों की खरीद की योजना बनाई। इसके बाद साल 2016 में भारत और फ्रांस के बीच 59 हजार करोड़ के सौदे पर करार हो गया। लेकिन उसके बाद कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाने लगी कि विमानों की खरीद के लिए ऊंची कीमतें लगाई गई हैं, इसमें रिलायंस को भागीदारी क्यों बनाया गया? 

कांग्रेस के ये हैं सवाल 

कांग्रेस का कहना है कि यूपीए के राफेल समझौते में एक विमान की कीमत 526 करोड़ रुपये थी जो मोदी सरकार ने 1570 करोड़ रुपये में लगभग तीन गुनी कीमत के साथ लिया जा रहा है, इस नुकसान का जिम्मेदार कौन है?

कांग्रेस का यह भी कहना है कि साल 2016 में फ्रांस में हुए समझौते में सुरक्षा पर बनी कैबिनेट कमेटी की मंजूरी नहीं ली गई। इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, क्या इस पर भ्रष्टाचार का केस नहीं बनता है?

कांग्रेस का तीसरा सवाल है कि नवंबर साल 2017 में रक्षा मंत्री ने कहा था कि 36 राफेल विमान इमरजेंसी के लिए तत्काल रूप से लिए गये। अगर ऐसा था तो समझौते के इतने समय बाद भी एक भी राफेल विमान क्यों नहीं मिला है?
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राफेल की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट में नहीं होगी बहस 

इस मामले पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी, जिसमें अदालत ने साफ कह दिया है कि राफेल की कीमतों पर बहस नहीं होगी। जब जरूरत महसूस होगी, तभी इसका खुलासा किया जाएगा। हालांकि अब आगे भी ऐसा लगता नहीं है कि राफेल की कीमतों के खुलासे पर जोर दिया जाएगा। हालांकि इसमें यह सबसे बड़ा सवाल उभरकर सामने आ रहा है कि अगर ऑफसेट पार्टनर के तौर पर अंबानी और बिचौलियों को फायदा, जैसी अनियमितताओं की जांच के आदेश दिए जाते हैं तो मामले की जांच कौन करेगा, क्योंकि सीबीआई तो खुद सवालों के घेरे में है।  

2019 में भारत आ जाएगा राफेल 

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो सितंबर 2019 में पहला राफेल भारत पहुंच जाएगा। हालांकि सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के प्रोफेसर भरत कर्नाड का कहना है कि वायुसेना के पास तब भी विमानों की कमी बनी रहेगी, क्योंकि वायुसेना को फिलहाल ज्यादा विमानों की जरूरत है। 
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