कृषि क्षेत्र में संकट और इसके निदान पर अपने देश में बहस कोई नई बात नहीं है। नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण के दौर की शुरुआत के बाद इस विषय पर बहस तेज हुई है। भारत पर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का दबाव है कि किसानों को मिलने वाला एमएसपी और हर प्रकार की सब्सिडी केंद्र सरकार समाप्त करे।
किसान संगठनों का दावा है कि केंद्र सरकार की मंशा दरअसल नए कृषि कानूनों के जरिये आने वाले समय में डब्ल्यूटीओ की राह पर चलने की है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि देश के कृषि क्षेत्र की बदहाली पश्चिमी देशों के विकास मॉडल से दूर होगी या फिर भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुकूल स्वदेशी मॉडल तैयार करना होगा।
प्रति एकड़ कम पैदावार, प्रति किसान खेती का बेहद छोटा रकबा, भंडारण-आधुनिक तकनीक की कमी, हर साल अलग-अलग खाद्यान्नों का सरप्लस उत्पादन। उस पर अन्नदाताओं पर दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले सबसे अधिक बोझ। देश में खेती-किसानी की बेहाली के कई कारण हैं। सरकारें इस बेहाली को दूर करने के लिए पश्चिम देशों के विकास मॉडल को ही रामबाण मानती रही हैं। इस क्षेत्र की बदहाली दूर करने पर सभी सहमत हैं, मगर बदहाली दूर करने के तरीके पर दशकों से मतभेद भी चले आ रहे हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि कृषि क्षेत्र को तरक्की की राह पर लाए बगैर देश की अर्थव्यवस्था का भला नहींं हो सकता। हाल ही में कृषि क्षेत्र के लिए लाए गए तीन कानूनों के बाद देश में खेती-किसानी पर नए सिरे से बहस तेज हुई है।
एक तरफ सरकार व अनेक अर्थशास्त्री इस बात को मानते हैं कि कोरोना वायरस काल में कृषि क्षेत्र के आधार पर ही देश की अर्थव्यवस्था का पहिया घूम रहा है, दूसरी तरफ आंदोलन कर रहे किसानों का कहना है कि केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर खरीद बंद कर के उनका शोषण करने में लगी हुई है। केंद्र सरकार का दावा है कि इन अध्यादेशों के किसानों को फायदा होगा लेकिन असल में किसानों को नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी कंपनियों को फायदा होगा। पूरी दुनिया में कृषि क्षेत्र सरकारी मदद और सब्सिडी पर टिका है ।