फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

प्रोटोकॉल और परंपरा के बीच: माहौल ऐसा था सम्मान देते-देते राष्ट्रपति की भी आंखें भर आईं

Sun, 28 Jan 2018 03:35 PM IST
सुकेश रंजन
विज्ञापन
विज्ञापन

छब्बीस जनवरी बीत गई। आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ ही देशभर के लोगों ने भारत की शक्ति राजपथ पर देखी। देशवासी इतराए होंगे, तो दूसरे देशों से आए मेहमानों ने दांतों तले उंगली दबा ली होगी। सबने देखा कि कैसे बिहार के एक सपूत ने अपनी जान की परवाह किए बिना आधा दर्जन आतंकियों को मौत की नींद सुला दिया।

विज्ञापन


देश की रक्षा करते हुए एयरफोर्स के इस गरुड़ कमांडो ज्योति प्रकाश निराला ने हंसते-हंसते जान दे दी। मां-बाप का अकेला लाड़ला अपने पीछे अपनी बेवा के अलावा दो साल की बिटिया छोड़ गया है। दो जवान बहनें भी हैं, जो अब किसी को राखी नहीं बांध पाएंगी।

राष्ट्रपति ने उसे मरणोपरांत शांतिकाल के सबसे बड़े सैनिक सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया। माहौल ऐसा था कि सम्मान देते-देते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की भी आंखें भर आईं। 
विज्ञापन


इसी बीच, कांग्रेस की तरफ से एक ट्वीट सामने आया। राहुल गांधी को गणतंत्र दिवस के समारोह में चौथी पंक्ति में जगह दी गई थी। वहां पहुंचते-पहुंचते वह छठी पंक्ति में पहुंच गए। कांग्रेस को बहुत बुरा लगा। उसने सरकार के इस कदम को अहंकारी बताया। कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता अपने नए नवेले अध्यक्ष को इतना पीछे धकेलने के लिए सरकार को धिक्कारने में लग गए।

सोचा था कि आने के बाद यह रिसर्च करूंगा कि जिन जांबाजों को पहले वीरता के लिए सम्मानित किया गया है, उनकी आज हालत कैसी है, लेकिन खोज इस बात पर शुरू करनी पड़ी कि क्या पहले भी ऐसा हुआ है। गणतंत्र दिवस के समारोह की छठी पंक्ति में राहुल गांधी के साथ राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद बैठे दिखे। इससे पहले सोनिया गांधी पहली पंक्ति में बैठती थीं, तो ऐसा क्या हुआ कि राहुल पीछे हो गए।

सरकार के सूत्रों का कहना है कि सबकुछ यूपीए के दौरान तय किए गए प्रोटोकॉल के तहत हुआ। मगर राहुल गांधी से आगे की पंक्ति में कुछ ऐसे लोग भी नजर आए, जो प्रोटोकॉल में तो कहीं नहीं हैं। इसके बाद राष्ट्रपति के 'ऐट होम' में राहुल दूसरी कतार में दिखे। तमाम लोगों से मिलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल से रुक कर कुछ देर बात भी की। यह बातचीत दुआ सलाम जैसी लगी, लेकिन चलिए इतना तो हुआ। राजनीतिक दलों की हालत तो ऐसी होती जा रही है कि यह रस्म अदायगी भी कितने दिन चलेगी कहना मुश्किल है।

कौन कहां बैठेगा, प्रोटोकॉल में किसकी जगह क्या है, इस पर बहस चलती रही है। 2012 में प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति थे। गणतंत्र दिवस के समारोह के लिए लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की तो पहली पंक्ति में जगह बनी रही, लेकिन शाम के ऐट होम कार्यक्रम में इनमें से किसी को मुगल गॉर्डन के एनक्लोजर में जगह नहीं मिल पाई। आडवाणी उस वक्त एनडीए के अध्यक्ष थे, सुषमा और जेटली लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता।

इसके चार दिन पहले ही उपराष्ट्रपति के शपथग्रहण समारोह में भी आडवाणी को चौथी पंक्ति में जगह दी गई थी। चार दिनों के अंतराल में दो-दो बार अपने नेताओं की बेइज्ज्ती भाजपा झेल नहीं पाई और उसने इस मामले को प्रमुखता से उठाया। प्रणब मुखर्जी ने इन तीनों नेताओं को फोन किया और उन्हें न सिर्फ इस बात का आश्वासन दिया कि इस मामले की जांच कराई जा रही है, बल्कि राष्ट्रपति भवन में वीआईपी लोगों के बैठने की व्यवस्था पर पुनर्विचार करने के आदेश भी दे दिए गए।
विज्ञापन

ऐसा नहीं है कि कुर्सी और उसकी जगह को लेकर मार पहली बार मची। 2016 में जयललिता मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रही थीं और विपक्ष के नेता के तौर पर शपथ ग्रहण में हिस्सा लेने आए करुणानिधि के बेटे और द्रमुक विधायक दल के नेता स्टालिन को बारहवीं कतार में जगह मिली थी।

खूब हाय तौबा मची। अन्नाद्रमुक और द्रमुक के संबंध जगजाहिर थे, सो सीधा आरोप लगा कि जयललिता ने जानबूझकर स्टालिन की बेइज्जती की। जयललिता काफी परिपक्व नेता थीं। उन्होंने बयान जारी कर कहा कि मालूम होता कि आप शपथ ग्रहण में आएंगे, तो निर्देश दिया होता कि आपको पहली पंक्ति में बिठाया जाए। मामला रफा-दफा हो गया।

एक और वाकया नरेंद्र मोदी से जुड़ा है। 2009 में मोदी मुख्यमंत्री थे। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल एक निजी समारोह में हिस्सा लेने गुजरात जा रही थीं। कांग्रेस नेता और उस वक्त केंद्र सरकार में मंत्री दिनशा पटेल नहीं चाहते थे कि मोदी उस कार्यक्रम में आएं, लेकिन बताते हैं कि बाद में मोदी को वहां बुलाना पड़ा।

इतना ही नहीं मोदी के कार्यालय ने प्रोटोकॉल के हिसाब से खुद की सीट राष्ट्रपति के बगल में करने की मांग की। यहां भी राष्ट्रपति कार्यालय को बीच में आना पड़ा और फिर मोदी को महामहिम की बाईं वाली सीट मिली। एक होता है प्रोटोकॉल, एक होती है परंपरा। राजनीतिक पार्टियां इसी के इर्द-गिर्द बने निशान पर चलती आई हैं। जनता को भी यही देखने की आदत हो गई है। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें