Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश की मध्यस्थता व्यवस्था में प्रक्रियागत समस्याएं आ रही हैं और केंद्र को मौजूदा कानून में जरूरी बदलाव करने चाहिए। कोर्ट ने मध्यस्थता और सुलह विधेयक, 2024 में इस सुधार के लिए कोई कदम न उठाए जाने पर निराशा जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रक्रियागत मुद्दे देश में मध्यस्थता व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। केंद्र को मौजूदा कानून में आवश्यक बदलाव करने चाहिए। दुर्भाग्य से मध्यस्थता और सुलह विधेयक, 2024 में मध्यस्थ न्यायाधिकरण को पक्षकार बनाने या उसमें शामिल होने के अधिकार पर कानून की स्थिति को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।
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जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने 191 पन्नों के फैसले में मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 में पिछले कुछ वर्षों में किए गए विभिन्न संशोधनों का जिक्र किया। जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि मध्यस्थता कार्यवाही तेजी से की जाए और उसका निष्कर्ष निकाला जाए।
पीठ ने कहा, यह सचमुच बहुत दुखद है कि इतने वर्षों के बाद भी, इस मामले से संबंधित प्रक्रियागत मुद्दे भारत की मध्यस्थता व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। पीठ ने कहा कि विधि मामलों के विभाग ने अब एक बार फिर मध्यस्थता पर मौजूदा कानून को मध्यस्थता और सुलह विधेयक, 2024 से बदलने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि 1996 के कानून में जो चीज गायब थी, वह मध्यस्थता और सुलह विधेयक, 2024 में अभी भी नहीं दिखती। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील को खारिज करते हुए पीठ ने रजिस्ट्री को अपने फैसले की एक प्रति सभी हाईकोर्ट व विधि एवं न्याय मंत्रालय के प्रधान सचिव को भेजने को कहा।
मध्यस्थता कानून में कोई भी अनिश्चितता व्यापार वाणित्य के लिए अभिषाप
पांच जजों की पीठ के हाल ही में दिए फैसले का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, मध्यस्थता के कानून में कोई भी अनिश्चितता व्यापार और वाणिज्य के लिए अभिशाप होगी। हम विधि और न्याय मंत्रालय के कानूनी मामलों के विभाग से आग्रह करते हैं कि वे भारत में प्रचलित मध्यस्थता व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करें और मध्यस्थता और सुलह विधेयक, 2024 पर अभी भी विचार किया जा रहा है, जबकि इसमें आवश्यक बदलाव किए जाएं।
क्या है मामला
शीर्ष अदालत का यह फैसला मध्यस्थता मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के पिछले साल जुलाई के आदेश के खिलाफ अपील पर आया है। हाईकोर्ट ने मध्यस्थ न्यायाधिकरण के आदेश की पुष्टि की थी। न्यायाधिकरण ने अपीलकर्ता फर्म की ओर से उसके अधिकार क्षेत्र पर की गई चुनौती को इस आधार पर खारिज किया था कि अपीलकर्ता ने मध्यस्थता समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इस कारण वह मध्यस्थता कार्यवाही में शामिल होने के लिए मामले में पक्षकार के रूप में शामिल नहीं हो सकता था। पीठ ने कहा, हाईकोर्ट के आदेश में कोई गलती नहीं है।