सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के चर्चित प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड के दोषी संतोष कुमार सिंह को दी गई परोल की अवधि बढ़ाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि मामले से जुड़ा मुख्य मुद्दा रिहाई पहले से ही दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है। परोल का मतलब है कि जेल में सजा काट रहे कैदी को कुछ शर्तों के साथ अस्थायी रूप से बाहर आने की अनुमति देना।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि यह मामला 18 मई को हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए निर्धारित है। सुप्रीम कोर्ट ने संतोष सिंह को यह स्वतंत्रता दी कि वह हाईकोर्ट से अपने मामले की जल्द सुनवाई की मांग कर सकते हैं।
सुनवाई के दौरान संतोष सिंह के वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने उन्हें आत्मसमर्पण करने का निर्देश देकर कड़ा आदेश दिया है, जबकि वह फिलहाल ओपन जेल में सजा काट रहे हैं, जहां उन्हें रोजाना सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक काम के लिए बाहर जाने की अनुमति होती है।
इससे पहले 19 मार्च को दिल्ली हाईकोर्ट ने संतोष सिंह को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था और कहा था कि उनकी समयपूर्व रिहाई की याचिका पर विचार आत्मसमर्पण के बाद ही किया जाएगा। इस पर प्रियदर्शिनी मट्टू के भाई ने कड़ा विरोध जताया था और कहा था कि सेंटेंस रिव्यू बोर्ड (SRB) द्वारा रिहाई की याचिका खारिज करना सही है।
गौरतलब है कि 25 वर्षीय प्रियदर्शिनी मट्टू की जनवरी 1996 में दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी। संतोष सिंह, जो उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र थे, को 1999 में निचली अदालत ने बरी कर दिया था, लेकिन 2006 में दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला पलटते हुए उन्हें दोषी ठहराया और फांसी की सजा सुनाई। बाद में 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।