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प्रियदर्शिनी केस: संतोष सिंह की परोल बढ़ाने की मांग खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से विचार करने को कहा

Fri, 10 Apr 2026 03:10 PM IST
Riya Dubey न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने संतोष सिंह की परोल बढ़ाने की मांग पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि उनका रिहाई से जुड़ा मामला पहले से दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है। कोर्ट ने संतोष को हाईकोर्ट में जल्द सुनवाई की मांग करने की छूट दी है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के चर्चित प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड के दोषी संतोष कुमार सिंह को दी गई परोल की अवधि बढ़ाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि मामले से जुड़ा मुख्य मुद्दा रिहाई पहले से ही दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है। परोल का मतलब है कि जेल में सजा काट रहे कैदी को कुछ शर्तों के साथ अस्थायी रूप से बाहर आने की अनुमति देना।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से क्या कहा?

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि यह मामला 18 मई को हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए निर्धारित है। सुप्रीम कोर्ट ने संतोष सिंह को यह स्वतंत्रता दी कि वह हाईकोर्ट से अपने मामले की जल्द सुनवाई की मांग कर सकते हैं।

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पीठ ने यह भी कहा कि अगर ऐसी मांग की जाती है, तो हाईकोर्ट मामले के तथ्यों को देखते हुए उस पर विचार करे, खासकर यह देखते हुए कि घटना 23 जनवरी 1996 की है और याचिकाकर्ता करीब 31 साल से जेल में है, जिसमें रिमिशन की अवधि भी शामिल है।

संतोष सिंह के वकील ने क्या दलीली दी?

सुनवाई के दौरान संतोष सिंह के वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने उन्हें आत्मसमर्पण करने का निर्देश देकर कड़ा आदेश दिया है, जबकि वह फिलहाल ओपन जेल में सजा काट रहे हैं, जहां उन्हें रोजाना सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक काम के लिए बाहर जाने की अनुमति होती है।

इससे पहले 19 मार्च को दिल्ली हाईकोर्ट ने संतोष सिंह को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था और कहा था कि उनकी समयपूर्व रिहाई की याचिका पर विचार आत्मसमर्पण के बाद ही किया जाएगा। इस पर प्रियदर्शिनी मट्टू के भाई ने कड़ा विरोध जताया था और कहा था कि सेंटेंस रिव्यू बोर्ड (SRB) द्वारा रिहाई की याचिका खारिज करना सही है।

1996 का मामला

गौरतलब है कि 25 वर्षीय प्रियदर्शिनी मट्टू की जनवरी 1996 में दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी। संतोष सिंह, जो उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र थे, को 1999 में निचली अदालत ने बरी कर दिया था, लेकिन 2006 में दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला पलटते हुए उन्हें दोषी ठहराया और फांसी की सजा सुनाई। बाद में 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।

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पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट ने SRB के उस फैसले को खारिज कर दिया था, जिसमें संतोष सिंह की समयपूर्व रिहाई की मांग ठुकरा दी गई थी। अदालत ने कहा था कि उनके सुधारात्मक व्यवहार का सही मूल्यांकन नहीं किया गया। साथ ही यह भी माना गया कि ओपन जेल में रखा जाना उनके सकारात्मक सुधार का संकेत है।
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