तिरूवनंतपुरम में राजभवन के बाहर डॉक्टरों का प्रदर्शन
- फोटो : ANI
आईएमए के प्रस्तावित बंद के मद्देनजर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सोमवार को केंद्र सरकार द्वारा संचालित एम्स, सफदरजंग, राम मनोहर लोहिया, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज समेत सभी सरकारी अस्पतालों से स्वास्थ्य सेवाएं और आपातकालीन सेवाएं सुचारु रूप से जारी रखने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा।
हालांकि कर्नाटक के हुबली में विवेकानंद सामान्य अस्पताल में सन्नाटा पसरा हुआ है। डॉक्टरों ने मंगलवार को सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक बंद के समर्थन में कामकाज बंद कर दिया है।
एनएमसी विधेयक का विरोध करती रही आईएमए का कहना है कि, यह विधेयक डॉक्टरों के कामकाज को 'अपंग' बना देगा, जिससे डॉक्टर सिर्फ नौकरशाही और गैर-चिकित्सा प्रशासकों के प्रति पूरी तरह से उत्तरदायी हो जाएंगे। आईएमए ने इसके विरोध में मंगलवार को 'काला दिवस' घोषित किया।
आईएमए के सदस्य डॉक्टर पार्थिव सांघ्वी ने कहा है कि, 'डॉक्टरी के पेशे के इतिहास में पहली बार 'काला दिवस' कहने के अलावा केंद्र सरकार ने हमारे पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। 'नेशनल मेडिकल कमिशन को ना कहना पूरे चिकित्सा समुदाय के साथ-साथ हर रोगी के लिए एक नारा है।'
एनएमसी विधेयक 2017 लोकसभा में शुक्रवार को पेश किया गया था। आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल और अध्यक्ष रवि वानखेड़े केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा से मिलकर विधेयक में व्यापक संशोधन की मांग की है।
डॉक्टरों के हड़ताल के मुद्दे पर मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने राज्यसभा में बताया कि, 'आईएमए के सदस्यों से सोमवार को बातचीत हुई है। हमने उनकी बातें सुनी और अपना नजरिया भी सामने रखा।'
वहीं इस मुद्दे पर नोएडा के मशहूर फोर्टिस अस्पताल के आतंरिक चिकित्सा विभाग के हेड और निदेशक डा. अजय अग्रवाल ने भी विरोध जताया। डा. अग्रवाल का कहना था कि सरकार द्वारा लाए जा रहे एनएमसी विधेयक 2017 के कारण स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर गिरेगा और बेहतर चिकित्सक तैयार करने की प्रक्रिया भी बाधित होगी।
डा. अग्रवाल के अनुसार सरकार जो आयुष चिकित्सकों को ब्रिज कोर्स करके एलोपैथिक डॉक्टर के बराबर रखने की व्यवस्था कर रही है वह भी काफी नुकसानदायक है। एलोपैथिक चिकित्सक दस-दस साल की प्रैक्टिस के बाद जो अनुभव इकट्ठा करते हैं वो दो साल के ब्रिज कोर्स से कैसे पूरा हो सकता है।
इसके अलावा नए विधेयक में मेडिकल कालेजों में 60 फीसदी सीटें आरक्षण से भरने की मंशा भी खतरनाक है, यह सीधे सीधे मेडिकल एजुकेशन के स्तर को प्रभावित करेगी। मेडिकल जैसे फील्ड में जरूरी है कि छात्र आरक्षण के बजाय मेरिट से आएं।