प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 500 और 1000 रुपए के नोट को चलन से बाहर करने में बरती गई अति गोपनीयता की तुलना 1974 और 1998 के पोखरन न्यक्यूलियर टेस्ट से की जा रही है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में की गई पोखरन-1 और पोखरन-2 टेस्ट की योजना को लंबे समय तक गोपनीय (बेस्ट केप्ट सीक्रेट) रखने का बड़ा उदारहण माना जाता है। अफसरशाही और खुफिया हलकों में बड़ेनोट को बंद करने की योजना को गुप्त रखने की मोदी सरकार की सफलता को सरकारी गोपनीयता की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
उच्चपदस्थ सरकारी सूत्रों ने अमर उजाला को बताया कि करीब एक साल से इस योजना को कई स्तर पर अंजाम दिया जा रहा था। 500 और 2000 नोट के लिए विदेशी कंपनियों के साथ नए कागज व उससके हाईटेकरोशनाई (इंक) की डील से लेकर उसकी छपाई तक का काम अलग अलग जगहों पर हो रहा था। इसकेअलावा इसकेक्रियान्यवयन के लिए वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में फैसले लिए जा रहे थे। लेकिन किसी भी स्तर पर यह सूचना मीडिया में लीक नहीं हुई।
सूत्रों ने बताया कि अफसरशाही के शीर्ष स्तर पर सिर्फ चार लोगों को इसकी जानकारी थी। यह थे प्रधानमंत्री केप्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा, रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल, वित्त सचिव अशोक लवासा और आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दो महीने पहले इसकेठोस क्रि यान्यवयन की हरी झंडी दी थी। सूत्रों ने बताया कि इस योजना को गोपनीय रखना प्रधानमंत्री की पहली वरीयता थी।
इसी तरह स्माइलिंग बुद्धा ने कोड नाम से पोखरन-1 और ऑपरेशन शक्ति के कोड नाम से पोखरन-2 की योजना और क्रियान्यवयन की भनक देश तो क्या अमेरिका समेत किसी विदेशी एजेंसी को नहीं लगी थी। हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के कार्यकाल के दौरान पोखरन-2 की कोशिश की गई थी। लेकिन अमेरिका ने अपने जासूसी सेटलाईट के जरिए पोखरन की गतिविधि पकड़ ली थी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन केदबाव में राव को पीछे हटना पड़ा था। इस घटना के तीन साल बाद वाजपेयी ने अति गोपनीय तरीकेसे पोखरन-2 को अंजाम देकर पूरी दुनिया को चौंका दिया।