कांग्रेस पार्टी को 2019 के आम चुनाव के लिए तैयार की जा रही पृष्ठभूमि में उन्हें कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान ऐसे सवाल का अंदाजा था।
सूत्र बताते हैं कि राहुल से पहले कई बार इस तरह के और दूसरी जिम्मेदारियों से जुड़े सवाल पूछने पर टालते रहे हैं, लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान से वह कोई संकोच नहीं कर रहे हैं। दरअसल राहुल पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं के बीच में नेतृत्व को लेकर पैदा हो रहे हर संशय को समाप्त करने के बाद राजनीतिक दलों के बीच में पनप रहे भ्रम को भी खत्म कर देना चाहते हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी महासचिव अशोक गहलोत पर काफी भरोसा करते हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के अनुसार कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की सलाह भी काफी मायने रखती है।
पार्टी के करीब-करीब सभी वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अब नेतृत्व को लेकर किसी तरह का रंच मात्र संशय नहीं रहना चाहिए। यह स्थिति जहां पार्टी के भीतर की गुटबाजी को कम करेगी वहीं विरोधी दलों से मुकाबले की स्थिति साफ होगी।
अहम यह है कि राहुल ने यह घोषणा यूपीए चेयपर्सन सोनिया गांधी की कर्नाटक में जनसभा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों पर हमला बोले जाने के बाद की है। इसके पीछे एक बड़ी वजह कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मजबूत जनाधार बनाती दिखाई दे रही कांग्रेस की स्थिति है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बीके हरिप्रसाद जब कहते हैं कि राहुल के यह स्वीकार लेने में क्या बुराई है? हरिप्रसाद जैसे नेता ऐसे ही नहीं कह रहे हैं। दरअसल राहुल गांधी ने एक सोची समझी रणनीति के तहत खुद को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया है।
चुनाव प्रचार का आज आखिरी दिन है। नामांकन पत्र दाखिल होने के बाद जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कर्नाटक में चुनाव प्रचार शुरू किया है, भाजपा को इसका जबरदस्त फायदा मिला है। प्रधानमंत्री बार-बार कांग्रेस पर हमला बोलकर उसे अपने राजनीतिक गोल पोस्ट में घसीटना चाह रहे थे।
कांग्रेस आईटी सेल के सूत्रों के अनुसार इस बार की रणनीति इसी से बचने की थी। इसके उलट कांग्रेस के नेता अपने राजनीति के मैदान पर प्रधानमंत्री और भाजपा नेताओं को लाकर घेरना चाहते थे। ताकि कांग्रेस अपने जनाधार को मजबूत बनाते हुए भाजपा को अधिक अवसर न दे। बताते हैं इसी रणनीति के तहत कांग्रेस अध्यक्ष ने चुनाव प्रचार खत्म होने के तीन दिन पहले ही संवाददाता की तरफ से आए सवाल का सधा जवाब दे दिया।
इसके सामानांतर भाजपा के कर्नाटक प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर की टीम के सदस्यों का मानना है कि मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच में है। दोनों दलों के बीच में छिड़े राजनीतिक घमासान के बीच में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की पार्टी जद(एस) कुछ खास नहीं करती नजर आ रही है।
कांग्रेस नेताओं के मुताबिक भाजपा से जद(एस) की नजदीकी, कुमार स्वामी की भाजपा नेताओं से भेंट, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देवगौड़ा की तारीफ ने जद(एस) के प्रभाव पर आसर डाला है। कांग्रेस के रणनीतिकार इसे दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय जैसी कहावत से जोड़ रहे हैं। बताते हैं इसलिए चुनाव प्रचार में जनता के बीच में कांग्रेस अपना वर्चस्व बनाए रखने की रणनीति पर चल रही है।