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...तो क्या कैराना उपचुनाव तक नहीं बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम? 

Tue, 08 May 2018 12:21 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : SELF
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अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 75 डॉलर से ऊपर जाने के बावजूद घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ने से सरकारी तेल कंपनियों के नुकसान के पथ पर बढ़ने के आसार दिखने लगे हैं। हालांकि इस बारे में तेल विपणन कंपनियां या सरकार की तरफ से कुछ बयान नहीं आया है लेकिन राजनीति की समझ रखने वाले इसे चुनाव से जोड़ कर देखने लगे हैं। पहले कहा जा रहा था कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव तक ऐसे ही चलेगा लेकिन अब कहा जा रहा है कि कैराना लोकसभा उपचुनाव तक समीक्षा नहीं होगी। हालांकि, यदि ऐसा होता है तो तेल विपणन करने वाली तीनों सरकारी कंपनियों को करोड़ों रुपये का नुकसान हो चुका होगा।       

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इंडियन फाउंडेशन ऑफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग -आईएफटीआरटी- के सीनियर फेलो एस पी सिंह का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का दाम 75 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया है जबकि घरेलू बाजार में पेक्रोल और डीजल की कीमतों में बीते 24 अप्रैल के बाद इजाफा ही नहीं हुआ है। उनके मुताबिक ऐसा राजनीतिक कारणों से हो सकता है लेकिन कब तक इंतजार होगा, 12 मई को होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव तक या 28 मई को होने वाले कैराना उपचुनाव तक?     
  
एस पी सिंह पूछते हैं कि जब सरकार ने पेट्रोल-डीजल के मूल्य को नियंत्रण से बाहर कर दिया है तो फिर इस तरह से दाम को अंतर्राष्ट्रीय मूल्य के मुकाबले नहीं बढ़ने से देने से नुकसान किसका होगा। इससे नुकसान तेल कंपनियों का तो होगा ही, जनता का भी होगा क्योंकि जब नियंत्रण हटेगा तो एक साथ कीमतें बढ़ेंगी। 1998 के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि इसी तरह चुनाव के चक्कर में बहुत दिनों तक डीजल के दाम को 9.70 रुपये पर काफी दिनों तक स्थिर रखा गया था। बाद में चुनाव होने पर एक साथ 40 फीसदी दाम बढ़ा दिया गया था।        
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बीते 24 अप्रैल को हुई थी अंतिम समीक्षा       
घरेलू बाजार में 17 जून 2017 से ही डीजल-पेट्रोल की कीमतों में दैनिक समीक्षा हो रही है। फिलहाल अंतिम बार समीक्षा बीते 24 अप्रैल को हुई है जबकि दिल्ली में पेट्रोल के दाम 74.63 रुपये जबकि डीजल के दाम 65.93 रुपये प्रति लीटर तय हुआ था। उस समय कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल के करीब थी। अब जबकि इसके दाम 75 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चले गए हैं तो इससे तेल कंपनियों को नुकसान होना तय है। ऊपर से डॉलर के मुकाबले रुपया के कमजोर पड़ने से स्थिति और विकट हुई है। सोमवार को एक डॉलर का भाव 67.13 रुपये तक गिर गया था जो कि पिछले कारोबारी दिवस के मुकाबले 25 पैसे की कमजोरी दिखाता है।       

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