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Supreme Court: 'एहतियाती हिरासत राज्यों की असाधारण ताकत, संयम बरतें'; केरल हाईकोर्ट का फैसला पलट कर बोली अदालत

Sat, 07 Jun 2025 08:15 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि अगर किसी आरोपी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है, तो राज्य को उचित अदालत में जाकर उसकी जमानत रद्द करवानी चाहिए, न कि उसे एहतियाती हिरासत में लेना चाहिए। इस फैसले के साथ शीर्ष अदालत ने केरल हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया।
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Supreme Court - फोटो : PTI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि एहतियाती हिरासत राज्य के पास एक असाधारण शक्ति है और इसका बहुत ही सीमित व विशेष परिस्थितियों में ही उपयोग किया जाना चाहिए। अदालत ने यह टिप्पणी उस समय की जब उसने केरल के पलक्कड़ जिले के एक जिलाधिकारी की तरफ से एक साहूकार को हिरासत में लेने के आदेश को रद्द कर दिया।
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क्या है पूरा मामला?
राजेश नाम के एक व्यक्ति, जो कि एक निजी फाइनेंस कंपनी 'ऋतिका फाइनेंस' चलाता था, के खिलाफ केरल मनी लेंडर्स एक्ट, 1958 के तहत चार मामले दर्ज थे। इन मामलों में उसे जमानत मिल चुकी थी, लेकिन पुलिस का आरोप था कि वह बेल की शर्तों का उल्लंघन कर रहा था। इसके आधार पर जिलाधिकारी ने उसे एहतियाती हिरासत में लेने का आदेश दिया।

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने कहा, 'एहतियाती हिरासत संविधान के अनुच्छेद 22(3)(b) में मान्यता प्राप्त है, लेकिन यह एक असाधारण शक्ति है, जो किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को उसके द्वारा आगे अपराध करने की आशंका के आधार पर पहले ही सीमित कर देती है। इसलिए, इसका इस्तेमाल सामान्य परिस्थितियों में नहीं किया जाना चाहिए।'

क्या कहा गया हिरासत आदेश के बारे में?
सुप्रीम कोर्ट ने 20 जून 2024 को जारी हिरासत आदेश और 4 सितंबर 2024 को केरल हाईकोर्ट द्वारा उसे बरकरार रखने वाले फैसले को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि इस मामले में एहतियाती हिरासत का आदेश कानूनी रूप से उचित नहीं था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर राज्य सरकार चाहे तो संबंधित अदालत में जाकर आरोपी की ज़मानत रद्द करवाने की प्रक्रिया अपना सकती है, लेकिन उस पर यह फैसला कोर्ट की मौजूदा टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।

क्या है केरल का कानून?
सुप्रीम कोर्ट ने केरल के एंटी-सोशल एक्टिविटीज (रोकथाम) अधिनियम, 2007 का हवाला देते हुए बताया कि इसका उद्देश्य राज्य में कुछ खास आपराधिक गतिविधियों को रोकना है। इस कानून की धारा 2(j) के अनुसार, 'गुंडा' उन लोगों को कहा जाता है जो समाज के लिए खतरा हैं – जैसे नकली माल बनाने वाले, नशे के कारोबारी, शराब माफिया और साहूकार इत्यादि।
धारा 3 के तहत जिलाधिकारी किसी ऐसे व्यक्ति को एहतियाती हिरासत में लेने का आदेश दे सकता है जिसे 'ज्ञात गुंडा' माना गया हो।

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पुलिस का क्या तर्क था?
पुलिस ने राजेश को जिले का एक 'कुख्यात गुंडा' बताया और कहा कि वह समाज के लिए खतरा बन चुका है। इसके आधार पर जिलाधिकारी ने हिरासत का आदेश दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था कि आरोपी वाकई बेल की शर्तें तोड़ रहा था या एहतियाती हिरासत के लायक था।

परिवार की क्या है प्रतिक्रिया?
राजेश की पत्नी ने इस आदेश को गैरकानूनी बताते हुए केरल हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हबीयस कॉर्पस) दायर की थी। हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि आरोपी को अधिकतम वैधानिक हिरासत अवधि पूरी हो चुकी है, इसलिए 10 दिसंबर 2024 को उसे रिहा करने का आदेश दिया गया था। अब कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि हिरासत का आदेश कानून सम्मत नहीं था और ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है।



 
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