एक संसदीय समिति ने शुक्रवार को सरकार से अनुरोध किया कि वह जाति प्रमाणपत्र के समय पर सत्यापन को सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त मसौदा कानून तैयार करे और इस प्रक्रिया को ऐसा बनाए कि यह वास्तविक उम्मीदवारों पर नकारात्मक असर न डाले। संसदीय समिति ने कहा कि उसे ऐसे मामले मिले हैं, जहां कर्मचारियों को उनके सेवानिवृत्ति के अंतिम समय में जाति प्रमाणपत्र सत्यापित करवाने के लिए मजबूर किया गया, अन्यथा उनके खिलाफ चार्जशीट दायर की गई।
समिति ने अपनी पहले की सिफारिश को दोहराया
रिपोर्ट में कहा गया है कि, समिति इसलिए न केवल अपनी पहले की सिफारिश को दोहराती है कि सत्यापन प्रक्रिया में अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए, बल्कि यह भी सुझाव देती है कि कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के साथ समन्वय कर ऐसा उपयुक्त मसौदा कानून तैयार करे, जिससे जाति प्रमाणपत्र का समय पर सत्यापन सुनिश्चित हो सके और इस प्रक्रिया को वास्तविक अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों के लिए सरल बनाया जा सके।
सत्यापन प्रक्रिया में अभी भी समय लग रहा है- समिति
बीजेपी सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते की अध्यक्षता वाली इस समिति ने यह टिप्पणियां अपने दूसरे रिपोर्ट में की। यह रिपोर्ट कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय (कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग) के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण पर आधारित है, जो शुक्रवार को संसद में पेश की गई। इस रिपोर्ट में समिति ने चिंता व्यक्त की कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से 2 सितंबर 1994 को सामाजिक स्थिति प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए दिए गए विस्तृत दिशा-निर्देशों के बावजूद, सत्यापन प्रक्रिया में अभी भी समय लग रहा है।
'कई कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति लाभों को रोका गया'
समिति ने कहा, जाति प्रमाणपत्र के सत्यापन की प्रक्रिया अभी तक पूरी तरह से सुव्यवस्थित नहीं हुई है, जिससे कई अनुसूचित जाति/जनजाति कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति लाभों को रोका गया है। यहां तक कि कई बार सेवानिवृत्त कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है, लेकिन सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती। वहीं सरकार की प्रतिक्रिया में कहा गया कि मंत्रालयों, विभागों, उनके अधीनस्थ कार्यालयों, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों, स्वायत्त निकायों आदि को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि कर्मचारी के सेवा में शामिल होते ही उनके जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन शुरू हो और यह प्रक्रिया छह महीनों के भीतर पूरी हो।
समिति ने बताया, फिर भी, राज्य/संघ राज्य क्षेत्र की सरकारों के अधीन काम करने वाले अनुसूचित जाति/जनजाति कर्मचारियों के मामले में उनकी सेवानिवृत्ति के समय तक जाति सत्यापन लंबित रहने के कारण उनके पेंशन लाभ रोकने के कई मामले सामने आए हैं।