केंद्र सरकार जल्दी ही जम्मू कश्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करना चाहती है। सरकार का मानना है कि अनुच्छेद 370 और 35ए के तहत मिले विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त करने और राज्य को दो संघ शासित क्षेत्रों में पुनर्गठित करने के एक साल होने को है। इस दौरान केंद्र सरकार की देखरेख में एक तरफ आतंकवाद और अलगाववाद की कमर तोड़ी जा चुकी है तो दूसरी तरफ विकास को गति देने के लिए इतने बुनियादी काम हुए हैं। अब ऐसे में जम्मू और कश्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करके विधानसभा के चुनाव कराए जा सकते हैं। पूर्व आईएसएस अधिकारी मुर्मू की जगह उपराज्यपाल पद पर मनोज सिन्हा की नियुक्ति इस दिशा में पहला कदम है।
मनोज सिन्हा न सिर्फ इस संघ शासित क्षेत्र के दूसरे उपराज्यपाल हैं बल्कि वह दूसरे राजनीतिक व्यक्ति हैं जिन्हें आतंकवाद और अलगाववाद के जवाब में कश्मीर में विकास और स्थायित्व का मार्ग प्रशस्त करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके पहले जब जम्मू कश्मीर पूर्ण राज्य था तब पहली बार खांटी राजनीतिक सत्यपाल मलिक को राज्यपाल बनाकर भेजा गया था, जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई और अनुच्छेद 370 व 35 ए को हटाने का रास्ता तैयार किया। इसलिए सिन्हा को अब मलिक से बड़ी लकीर खींचनी होगी।
नए उपराज्यपाल मनोज सिन्हा इस बात से संतुष्ट हो सकते हैं कि पिछले एक साल में सामान्य स्थिति की बहाली के लिए कई ऐसे कदम उठाए गए हैं, जो यहां के लोगों का भारत के प्रति विश्वास और मजबूत करेंगे। हालांकि भरोसा जीतने का काम मलिक के कार्यकाल में ही शुरू हो गया था, जब राज्य में 52 नए डिग्री कालेज खोले गए। 282 प्राइमरी स्कूलों को अपग्रेड करके हायर सेकंडरी स्कूल बना दिया गया।
धनाभाव में रुकी परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त आठ सौ करोड़ रुपए आवंटित करके उन्हें पूरा किया गया। देशभर के विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा और देखभाल के लिए राज्य सरकार ने संपर्क अधिकारी नियुक्त किए और खुद राज्यपाल ने लगभग सभी कुलपतियों से बात करके कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने का अनुरोध किया।
मलिक ने सबसे बड़ा काम जम्मू कश्मीर विधानसभा को तब भंग करके किया, जब दिल्ली में भाजपा के कुछ शीर्ष नेता पीडीपी को तोड़कर सरकार बनाने की कोशिश में थे। गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक अगर विधानसभा भंग नहीं होती तो अनुच्छेद 370 और 35ए हटाना मुमकिन नहीं था। इसके बाद पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनाव शांतिपूर्वक कराए जा चुके हैं। कुल 58,54,208 मतदाताओं में 74 फीसदी से ज्यादा मतदान के बाद 3850 सरपंचों और 23660 पंचों को चुना गया। इन चुनावों से विधानसभा चुनावों के लिए एक आधार तैयार हो चुका है, जिससे राजनीतिक प्रक्रिया बहाली में मदद मिलेगी।
यहां केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे विकास कार्यक्रमों से होने वाले बुनियादी बदलावों को अंजाम देने में जुटे अधिकारियों के मुताबिक अनुच्छेद 370 और 35ए ने आजादी के बाद से ही कश्मीर को शेष भारत की विकास यात्रा से अलग कर दिया था। कुछ चुनिंदा प्रभावशाली लोगों को ही इसका फायदा मिला, लेकिन आम जनता और विशेषकर गरीब नुकसान में रहे। देश के कई सुधारवादी और कल्याणकारी कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हो सके थे।