उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (एनसीजेडसीसी) के पूर्व निदेशक गौरव कृष्ण बसंल (वर्तमान में सीपीआरओ एनसीआर) पर हाईकोर्ट ने सबक के तौर पर एक रुपये का हर्जाना लगाया है। कोर्ट ने बंसल की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए उनके द्वारा दिया गया कर्मचारी की बर्खास्तगी कर आदेश रद्द कर दिया है। सहायक कार्यक्रम अधिकारी कृष्णानंद पांडेय की याचिका पर न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्र ने यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी को सेवा में निरंतर मानते हुए बहाल किया जाए। कोर्ट ने कहा कि पूर्व निदेशक द्वारा की गई कार्रवाई मनमानी और दुर्भावनापूर्ण है।
मात्र उनके आदेश का पालन नहीं करने पर उन्होंने संविदा कर्मी से जांच कराई और याची को सफाई का कोई मौका दिए बिना बर्खास्त कर दिया गया। जबकि कर्मचारी पर लगा आरोप ऐसा नहीं है कि उसके आधार पर बर्खास्तगी की जा सके। कोर्ट का कहना था कि सामान्यत: ऐसे मामलों में अदालत विभागीय जांच नए सिरे से करने की छूट देती है। मगर इस मामले में कार्रवाई इसलिए की गई कि याची बीमारी के कारण छुट्टी पर था। इसके बाद पूर्व निदेशक ने नियम कानून ताक पर रखकर अपने मुताबिक जांच कराई और उसे बर्खास्त कर दिया। इसलिए नए सिरे से जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
याची के अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी और विभू राय का कहना था कि याची का तबादला इलाहाबाद से बलिया कर दिया गया था। इसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया और इसके बाद बीमारी के कारण छुट्टी पर चला गया। याचिका दाखिल करने से नाराज पूर्व निदेशक बंसल ने डाक्टरों की टीम से याची की जांच कराई। डाक्टरों ने कहा कि याची अवसाद ग्रस्त नहीं है और काम करने योग्य है। इस आधार पर उन्होंने संविदाकर्मी से विभागीय जांच कराई और उसे बर्खास्त कर दिया। याची को अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया।
कोर्ट का कहना था कि विभागीय जांच दुर्भावनापूर्ण ढंग से कराई गई है। इसलिए बाद में की गई कार्रवाई भी दुर्भावनापूर्ण ही मानी जाएगी जो कानून की नजर में कायम रहने योग्य नहीं है। कोर्ट का कहना था कि पूर्व निदेशक के इस कृत्य पर अदालत उन पर भारी हर्जाना लगाना चाहती है मगर केंद्र सरकार के अधिवक्ता के सकारात्मक रुख को देखते हुए सिर्फ प्रतीकात्मक हर्जाना लगाया जा रहा है।