वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि अंग्रेजों के जमाने के कानूनों का आज भी दुरुपयोग किया जा रहा है। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफरुल इस्लाम पर उनके एक फेसबुक पोस्ट के कारण राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया है। भूषण ने कहा कि यह कानून का दुरुपयोग और बोलने की स्वतंत्रता का हनन है।
गुजरात पुलिस ने इस मामले में जो धाराएं लगाई हैं, उनमें सेक्शन 34 (कई लोगों के द्वारा आपराधिक कार्य करना), 295A (जानबूझकर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करना), 505 (1) (भय पैदा करने वाला कोई कथन फैलाना) और 120B (आपराधिक साजिश रचना) शामिल हैं।
कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने 24 मार्च से देश में पहले लॉकडाउन की घोषणा की थी। इसके बाद जनता की मांग पर केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने दूरदर्शन चैनल पर रामायण और महाभारत सीरियल शुरू करने की जानकारी दी थी। केंद्रीय मंत्री की इस घोषणा के बाद प्रशांत भूषण ने 28 मार्च को एक ट्वीट किया था।
इस ट्वीट में उन्होंने कहा था कि कोरोना संक्रमण रोकने के लिए केंद्र सरकार को जमीनी और प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
इस ट्वीट के साथ उन्होंने कार्ल मार्क्स की प्रसिद्ध टिप्पणी भी जोड़ दी थी जिसमें उन्होंने कहा था कि धर्म अफीम की तरह होता है। इसे खा लेने के बाद लोग नशे में रहते हैं और अपनी जरूरतों की बात नहीं करते हैं।
उनके इस ट्वीट को सोशल मीडिया में कई बार रिट्वीट भी किया गया था। इसे हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने वाला मानकर सेना के एक पूर्व अधिकारी जयदेव रजनीकांत जोशी ने राजकोट के भक्तिनगर थाने में शिकायत दर्ज करवाई।
बाद में इसे पुलिस से स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOP) को दे दिया गया। इस मामले में एक पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन और एक वरिष्ठ पत्रकार को भी आरोपी बनाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना के सामने प्रशांत भूषण की ओर से पेश वकील दुष्यंत दवे ने भी इसे ताकत का दुरुपयोग बताया। उन्होंने कहा कि इस ट्वीट से किसी समाज की भावनाएं आहत नहीं होती हैं।
प्रशांत भूषण पर दर्ज इस मामले में उन्हें कई वरिष्ठ वकीलों का भी समर्थन मिल रहा है। वरिष्ठ वकील आभा सिंह ने अमर उजाला से कहा कि सैकड़ों साल पुराने बने इन कानूनों का लगातार दुरुपयोग किया जा रहा है।
सरकार के किसी कार्य पर टिप्पणी करना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी होनी चाहिए, लेकिन इसे राजद्रोह का रूप देकर लोगों को परेशान किया जाता है।
उन्होंने कहा कि प्रशांत भूषण जैसे लोग तो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं, लेकिन लाखों लोगों को पुलिस ऐसे ही घिसे-पिटे कानूनों की आड़ में परेशान करती है। उनके पास कोर्ट तक पहुंचने की हैसियत भी नहीं होती और वे सालों-साल परेशान होते रहते हैं।
इसलिए स्वयं सर्वोच्च अदालत को इस मामले में संज्ञान लेना चाहिए और पुराने कानूनों को रद्द करने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। जो लोग सत्ता के इशारे पर बिना ठोस आधार के किसी निर्दोष पर कानूनी कार्रवाई करते हैं, उन पर भी दंड लगाना चाहिए।