वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस के जवाब में सोमवार को कहा कि मत की अभिव्यक्ति से अदालत की अवमानना नहीं हो सकती भले ही वह कुछ लोगों के लिए अरुचिकर या अस्वीकार्य हो। अदालत ने 22 जुलाई को भूषण को नोटिस जारी किया था। न्यायालय ने न्यायपालिका के खिलाफ उनके दो कथित अपमानजनक ट्वीट को लेकर शुरू की गई आपराधिक अवमानना कार्यवाही पर पांच अगस्त को सुनवाई का नोटिस जारी किया था।
न्यायालय ने उनके बयानों को प्रथम दृष्टया न्याय प्रशासन की छवि खराब करने वाला बताया था। कार्यकर्ता व वकील भूषण ने वकील कामिनी जायसवाल के माध्यम से दायर 142 पृष्ठों वाले जवाबी हलफनामे में उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों, लोकतंत्र में असंतोष को रोकने और अदालत की अवमानना पर पूर्व व मौजूदा न्यायाधीशों के भाषणों का भी जिक्र किया। इसके अलावा उन्होंने कुछ मामलों में न्यायिक कार्रवाई पर अपने विचारों का भी उल्लेख किया है।
भूषण अपने दोनों ट्वीट पर भी कायम रहे। उन्होंने दलील दी, ‘मत की अभिव्यक्ति, भले ही कुछ के लिए असहनीय या अरुचिकर हो, अदालत की अवमानना नहीं कर सकती है। यह बात सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों और ब्रिटेन, अमेरिका व कनाडा जैसे न्यायालयों में भी कही गई है।’ उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि यह अधिकार उन सभी मूल्यों का अंतिम संरक्षक है जिन्हें संविधान पवित्र मानता है। भूषण ने कहा कि संविधान द्वारा स्थापित किसी संस्था पर सार्वजनिक हित में किसी नागरिक को उचित मत व्यक्त करने से रोकना उचित प्रतिबंध नहीं है और यह उन बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है जिन पर हमारा लोकतंत्र स्थापित है।