लगभग 135 करोड़ लोगों की भारी-भरकम आबादी वाले भारत के लिए वर्ष 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना बेहद कठिन है। देश को एक तरफ इतनी बड़ी आबादी के लिए ऊर्जा उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी है तो साथ ही में कार्बन उत्सर्जन कम कर जानलेवा प्रदूषण पर लगाम भी लगानी है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एक निश्चित रणनीति अपनाकर तकनीकी सुधार कर इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए देश को ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों से हटते हुए बिजली खपत को वर्तमान 2000 टेरा वॉट से 9000 टेरा वॉट तक ले जाने की जरूरत होगी। साथ ही, हाइड्रोजन और सौर ऊर्जा जैसे ऊर्जा के नए माध्यमों को भी पूरी क्षमता के साथ अपनाना होगा।
वैश्विक स्तर पर ऊर्जा उपलब्ध कराने में हाइड्रोजन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। कई देशों में हाइड्रोजन की क्षमता का पर्याप्त उपयोग हो रहा है। लेकिन हमारे देश में हाइड्रोजन ऊर्जा का उपयोग लगभग नगण्य स्तर पर है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षमता का उपयोग बढ़ाकर कुल ऊर्जा का लगभग 13 फीसदी किया जाना चाहिए। इसके लिए भी भारी निवेश और हाइड्रोजन चालित इंजनों के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
प्रदूषण के सबसे महत्वपूर्ण कारकों भारी वाहनों, हवाईजहाज और भारी औद्योगिक गतिविधियों में कार्बन उत्सर्जन कम करने की अपनी एक निश्चित सीमा है। इन क्षेत्रों में इस स्तर से ज्यादा विद्युतीकरण अपनाना संभव नहीं होगा, लेकिन कार्बन उत्सर्जन की इस सीमित मात्रा को वृक्षारोपण जैसे प्राकृतिक उपायों से भरा जा सकता है और इस प्रकार 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल कर देश-दुनिया को एक बेहतर पर्यावरण उपलब्ध कराया जा सकता है।