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... तो अब 'आप' के लिए कांग्रेस बुरी हो गई! 

Fri, 18 Jan 2019 09:52 PM IST
Nilesh Kumar डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मीडिया को जानकारी देते हुए गोपाल राय - फोटो : अमर उजाला
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दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने की संभावना लगभग खत्म हो गई है। शुक्रवार को पार्टी के दिल्ली संयोजक गोपाल राय ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि कुछ दूसरे राजनीतिक दल चाहते थे कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ वोटों का बंटवारा न हो, इसलिए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को दिल्ली में मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए।

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उन्होंने कहा कि वे हमेशा से कांग्रेस के विरोधी रहे हैं और इस चुनाव में भी अकेले ही ताल ठोंकेंगे। आप नेता ने कहा कि इसी महीने की बीस तारीख को पार्टी पंजाब के बरनाला से चुनाव प्रचार शुरु करेगी। पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल इस अवसर पर उपस्थित रहेंगे।       

आप नेता ने कहा कि पार्टी दिल्ली, हरियाणा और पंजाब की सभी लोकसभा सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेगी और किसी भी दूसरे दल के साथ कोई समझौता नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि पार्टी पहले दिन से ही कांग्रेस की गलत नीतियों का विरोध करती आई है। 
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आम आदमी पार्टी के कारण ही कांग्रेस के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हुआ और उसी के कारण वह आज दिल्ली में जीरो पर है। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस का वश चलता तो वह मोदी सरकार की नाकामियों की तरफ से अपनी आंखें बंद भी कर लेती। लेकिन आम आदमी पार्टी देश के प्रति अपने दायित्व को समझते हुए संविधान और देश बचाने के लिए अपने कर्तव्य का निर्वहन करेगी।  

कैप्टन अमरिंदर के कारण बिगड़ा खेल

गोपाल राय ने कहा कि कांग्रेस को आज की जमीनी हालत का पता नहीं है और वह अपने घमंड में जी रही है। शीला दीक्षित के बयान का जिस तरह पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बचाव किया और आप के साथ गठबंधन की संभावना के खिलाफ बयान दिया, उसके बाद से ही पार्टी ने यह तय कर लिया कि अब कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं होना चाहिए। 

अब तक विरोध में बरत रहे थे सावधानी 

आप पार्टी कांग्रेस के साथ लोकसभा चुनाव में गठबंधन करने की संभावनाओं पर काम कर रही थी। उसके कई शीर्ष नेता कांग्रेस के संपर्क में बताए जा रहे थे। यही कारण है कि इस बीच आप कांग्रेस पर कोई प्रतिक्रिया देने में सावधानी बरत रही थी। 

इसका नजारा तब लोगों के सामने आ गया था, जब दिल्ली विधानसभा में सिखों पर हुए हमलों में राजीव गांधी के नाम सेे प्रस्ताव आ गया था। बाद में पार्टी ने यह कहकर मामला संभालने की कोशिश की थी कि मूल प्रस्ताव में राजीव गांधी का नाम नहीं था और एक विधायक ने हाथ से लिखकर इसे शामिल कर दिया था (जो कि अवैध था)।

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