गेहूं लेकर आटा देने की मांग पूरी करवाने के लिए रंजीत अभिज्ञान के पास रोज फोन आते हैं। रंजीत रेहड़ी, पटरी वालों का एक एसोसियेशन चलाते हैं। उनकी लड़ाई लड़ते हैं। दिल्ली रोजी-रोटी अधिकार अभियान के साथ काम कर चुकी कनिका को भी यह मुद्दा बड़ा गंभीर लग रहा है। सोनू जिंदल की एक किराना की दुकान है। जिंदल कहते हैं कि उनके पास कुछ गरीब लोग आते हैं। उनके पास सूखा राशन होता है। वह चाहते हैं कि उनका गेहूं लेकिन उन्हें वह आटा दे दें। सोनू का कहना है कि वह सरकारी गेहूं तो नहीं लेते, लेकिन थोड़ा बहुत आटा देकर भेज देते थे। अब वह चाहकर भी आटा नहीं दे पाते, क्योंकि खुला आटा उन्हें मिलना बंद हो गया है। बात छोटी सी है लेकिन गरीब के लिए आज यह समस्या बहुत बड़ी बन गई है। समाधान हाथ से दूर...
केंद्र सरकार के खाद्य एवं आपूर्ति वितरण विभाग के सूत्र का कहना है कि किसी ने कोविड-19 और लॉकडाउन के बारे में सोचा नहीं था। मानते हैं, यह बड़ी समस्या है, लेकिन इसका अभी सरकार के पास कोई समाधान नहीं है। इसका इंतजाम जिन्हें सूखा अनाज मिल रहा है, वे किसी न किसी रूप में कर लेते हैं।
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कांग्रेस पार्टी के नेता, प्रवक्ता गौरव वल्लभ पंत को यह व्यवहारिक समस्या नजर आती है, क्योंकि लॉकडाउन चल रहा है। लेकिन बिना पार्टी फोरम पर चर्चा किए वह ऐसे मुद्दे पर राय नहीं देना चाहते। भाजपा के एक सांसद ने कहा कि मुद्दा बड़ा जायज है। व्यावहारिक समस्या है, लेकिन उनके पास भी अनाज के पैकेट राहत में देने के सिवा कोई चारा नहीं है। एफसीआई के गोदाम में भी सूखा अनाज ही है। लोग चावल, दाल खाएं।
उत्तर प्रदेश के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि छोटे-छोटे शहरों में रात में आटा चक्की चलती है, लोग वहां गेहूं पिसवाकर आटा पा जाते हैं। लखनऊ जैसे बड़े शहर में पैकेट वाला आटा बिकता है। हां, गरीबों को जो सूखा राशन बंट रहा है, उन्हें कोई न कोई जुगाड़ करना पड़ता है।
बताइए भला गरीब, मजदूर कैसे रह पाएंगे?
रंजीत अभिज्ञान सवाल उठाते हैं कि आप बताइए, इस लॉकडाउन में गरीब, मजदूर कैसे महानगर में रह पाएगा। पहला तो लोगों के पास राशन कार्ड नहीं है। जिसके पास है, उसे सरकार सूखा अनाज दे रही है। उसमें गेहूं है। आप मुझे बताइए कि गरीब इस गेहूं से आटा कैसे पाएगा? सरकारी कंट्रोल की दुकान से मिला गेहूं भी दुकान पर वह बेच नहीं सकता।
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केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार उसकी इस व्यवहारिक समस्या को क्यों नहीं समझ पाती। सीताराम रिक्शा चलाते हैं। पटपडगंज में मंडावली के पास रहते हैं। उनकी भी समस्या यही है। सीताराम का कहना है कि उनका मोबाइल सड़क पर कोई आदमी कम पैसे में आसानी से खरीदने की बात कर लेता है, लेकिन राशन की दुकान का गेहूं नहीं खरीद रहा है। आखिर वह आटा कहां से लाएं। रोटी कैस खाएं।