अखिलेश यादव और मायावती की बात कोई डेढ़ घंटे हुई है। डेढ़ घंटे में दोनों नेताओं ने क्या बात की है, यह कि अखिलेश और मायावती के अलावा अक्षरश: किसी को पता नहीं है। लेकिन समझा जा रहा है कि इस दौरान क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति के मौजूदा दौर पर चर्चा हुई है।
अखिलेश के करीबी संजय लाठर का भी कहना है कि वह भी वास्तविकता को पूरी तरह से नहीं जानते। जबकि अखिलेश के दिल्ली आने पर संजय लाठर भी दिल्ली आ गए थे और उनके जाने के बाद लाठर भी लौट गए। मायावती की पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि उन्हें दोनों नेताओं के बीच में हुई बातचीत की जानकारी नहीं है।
कांग्रेस के पीएल पूनिया ने इस बीच बड़ा बयान दे दिया है। पूनिया का कहना है कि कांग्रेस पार्टी उ.प्र. में अकेले चुनाव लडऩे की तैयारी कर रही है। हालांकि राजबब्बर समेत अन्य नेता अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी मान रहे हैं।
राजबब्बर का कहना है कि उ.प्र. की जनता सपा-बसपा, कांग्रेस समेत अन्य की एकता चाहती है। कांग्रेस इस मामले में कोई भी ऐसा बयान देने से परहेज कर रही है, जो सपा और बसपा की गरिमा को किसी भी तरह से ठेस पहुंचाता हो।
मोडलटीज पर हुई चर्चा
ऐसा माना जा रहा है कि अखिलेश यादव और मायावती पके बीच में राजनीतिक परिदृ़श्य, संभावित सहयोगियों, उ.प्र. की दलगत, जातिगत राजनीतिक स्थिति पर चर्चा हुई है। दोनों नेताओं के बीच में म.प्र. और राजस्थान में कांग्रेस की सरकारों के ऊपर दबाव बनाने के बाबत भी चर्चा हुई है।
इसके अलावा सपा ने अपने प्रभाव वाली और बसपा ने अपने प्रभाव वाली सीटों को लेकर चर्चा की है। मायावती नोएडा(गोतमबुद्ध नगर) में अपना प्रत्याशी चाहती हैं। यहां से बसपा के सुरेन्द्र नागर सांसद थे। बाद में सुरेन्द्र नागर समाजवादी पार्टी में चले गए। अब वह समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती का मूल निवास बादलपुर है।
समाजवादी पार्टी को इस सीट को बसपा को देने में कोई बहुत इतराज नहीं है। इसके अलावा चर्चा के केन्द्र में शिवपाल सिंह यादव का प्रगतिशील समाजवादी पार्टी(आरएसपी) भी रहने की संभावना है।
ऐसे में क्या महागठबंधन बनेगा
मायावती राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ़ में विधानसभा को लेकर कांग्रेस से कुछ नाखुश हैं। अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ अच्छी दोस्ती का संकेत नहीं दे रहे हैं, लेकिन खुलकर नहीं बोलते। प्रो. राम गोपाल यादव भी इस सवाल के जवाब में बचते नजर आते हैं और यही स्थिति बसपा के दूसरे बड़े नेता सतीश चंद्र मिश्र की रहती है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, प्रमुख रणनीतिकार अहमद पटेल भी महागठबंधन के नाम पर इंतजार करने का संकेत करते हैं। यही स्थिति उ.प्र. के प्रभारी गुलाम नबी आजाद की भी है। राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी अजीत सिंह विदेश में हैं। दो दिन पहले उनका कहना था कि जनवरी के आखिरी सप्ताह तक इंतजार करना चाहिए।
समाजवादी पार्टी के उ.प्र. के नेता दो बातें कह रहे हैं। एक तो यह कि उन्हें सच का पता नहीं है और दूसरा सपा और बसपा दोनों गठबंधन से कांग्रेस को अलग रखना चाहते हैं। इस तरह के बयान कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि इसका निर्णय मायावती और अखिलेश यादव को करना है।
अभी इंतजार कीजिए, क्योंकि राज्य की जनता महागठबंधन चाहती है। दरअसल कांग्रेस बसपा के साथ गठबंधन की पुरजोर इच्छुक है। उ.प्र. विधानसभा चुनाव 2017 में भी कांग्रेस की पहली पसंद बसपा ही थी। बसपा से तालमेल न बन पाने पर कांग्रेस ने सपा को चुना था।
उ.प्र. लोकसभा चुनाव 2014 में बसपा को 19.55 तो सपा को 22.35 प्रतिशत वोट मिले थे। गठबंधन की दशा में बसपा ही ऐसा राजनीतिक दल है, जिसके अधिकतम मतदाता सहयोगी दल के प्रत्याशी को वोट देते(वोट ट्रांसफर) हैं। इसलिए बसपा से गठबंधन की अपनी अहमियत है। हालांकि कांग्रेस का एक धड़ा यह भी मानता है कि अकेले 2019 लोकसभा चुनाव में उतरना चाहिए।