कोरोना से दुनिया भर में 12 लाख से अधिक मौतें हो चुकी हैं। इसमें से 1.23 लाख से अधिक मौतें अकेले भारत में हुई हैं। फेफड़ों पर हमला बोलकर दम घोटने वाले वायरस के लिए दुनियाभर में फैला वायु प्रदूषण मददगार साबित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर हवा प्रदूषित न होती तो दुनिया भर में संक्रमण से हुई मौतों को रोका जा सकता था।
दूषित हवा के बढ़ते स्तर से फेफड़ों को होने वाला नुकसान हुआ दोगुना
नई दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल के फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अभिनव गुलियानी के अनुसार, महामारी के साथ प्रदूषण के बढ़ते स्तर से फेफड़ों को होने वाला नुकसान दोगुना हो गया है। वायु प्रदूषण गाड़ियों के दोहे और बड़े उद्योगों से निकलने वाला धुआं कोरोना महामारी के बीच घातक हुआ है। खासकर उन मरीजों के लिए जिन्हें सांस संबंधी तकलीफ पहले से है।
महामारी से सबसे ज्यादा श्वास रोगी या दूसरी इस गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोग ही प्रभावित हुए हैं। वायरस से जूझने वाले मरीज पर जब प्रदूषित कर हमला बोलते हैं तो उसके फेफड़े जवाब दे जाते हैं। वेंटिलेटर सपोर्ट पर जाने वाले मरीजों में मौत का खतरा ज्यादा रहता है और इसका सीधा असर मृत्युदर पर होता है।
महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक वायु प्रदूषण
कोरोना से बुरी तरह प्रभावित महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा दूषित हवा मुंबई में है। यहां वायु गुणवत्ता सूचकांक 168 है। रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में कुल 11 करोड़ से अधिक लोग दूषित हवा में जी रहे हैं जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है और कोरोना वायरस से सबसे अधिक मौतें भी यही हुई हैं। इसी तरह दिल्ली वायु प्रदूषण से दुनिया के 10 बुरी तरह प्रभावित शहरों में शामिल हैं जहां 6604 मौतें हो चुकी हैं।
मरीजों की जान बचाना होगा मुश्किल
डॉक्टर गुलियानी बताते हैं कि पीएम 2.5 के कारण अधिकतर कार के धुएं निर्माण स्थलों और जीवाश्म ईंधन के जलने से निकलते हैं और घातक होते हैं। वह बताते हैं कि हवा में मौजूद दूषित कारण जब सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचते हैं तो उसमें सूजन आने के साथ उसकी कोशिकाओं को नुकसान होता है। प्रदूषित कौन से धमनियों की भीतरी परत को नुकसान होता है। उनके सख्त होने से काम करने की क्षमता प्रभावित होती है।
बाल से भी छोटा होता है पीएम 2.5 कण
केजीएमयू के पल्मोनरी आईसीयू के डॉक्टर वेद प्रकाश बताते हैं कि पीएम 2.5 कण से भी सूक्ष्म होता है जो आसानी से सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंच जाता है। इससे फेफड़ों के कार्य करने की क्षमता प्रभावित होती है और अचानक मौत हो सकती है।
कई बार तो दवाई भी नहीं करती असर
कोरोना मरीजों वायरल लोड अधिक होने और पहले से कोई सांस संबंधी तकलीफ है तो गंभीर परिस्थिति में दवाएं भी बेअसर हो जाती हैं। नतीजतन हाई डोज की दवाई भी असर नहीं करती हैं और मरीज को वेंटीलेटर सपोर्ट देना पड़ता है।