सियासत में नए खिलाड़ियों के बीच सोनिया गांधी ठीक उसी तरह से विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास कर रही हैं, जिस तरह वे 2004 में यूपीए को एक प्लेटफार्म पर ले आईं थीं। तब उन्हें सफलता भी मिली थी। कुछ वैसा ही प्रयास वे '2024' के लिए कर रही हैं। बेंगलुरु में 18 जुलाई को प्रस्तावित विपक्षी दलों की बैठक से एक दिन पहले सोनिया गांधी ने 'डिनर' देने की बात कही है। पटना की बैठक में 15 विपक्षी दल शामिल हुए थे, जबकि बेंगलुरु में करीब दो दर्जन छोटे-बड़े दल पहुंच सकते हैं। आम आदमी पार्टी को भी न्योता भेजा गया है। ऐसी संभावना है कि अरविंद केजरीवाल न केवल डिनर में शामिल होंगे, बल्कि बैठक भी अटैंड करेंगे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 'दीदी' भी विपक्षी दलों की बैठक में आएंगी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भले ही सार्वजनिक मंच पर राहुल गांधी से कई मुद्दों पर इत्तेफाक नहीं रखने वाली 'दीदी', अपनी भाभी यानी सोनिया गांधी का निमंत्रण नहीं ठुकराएंगी।
यह भी पढ़ें: Maharashtra: महाराष्ट्र की सियासत में फंसा '34 का फेर', क्यों मुसीबत में हैं शिंदे गुट के विधायक?
बिखरे विपक्ष को एकजुट कर 'यूपीए' को सत्ता दिलाई थी
कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक में होने वाली विपक्षी दलों की यह बैठक काफी अहम मानी जा रही है। पटना में हुई बैठक के दौरान विपक्षी दलों ने भाजपा के खिलाफ साझा लड़ाई का संकल्प लिया था। 18 जुलाई को हो रही बैठक में विपक्षी दल, भाजपा के खिलाफ संयुक्त उम्मीदवार उतारने के लिए एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर चर्चा कर सकते हैं। जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक भी विपक्षी दलों को यह सलाह दे चुके हैं कि 2024 में उन्हें एक सीट, एक उम्मीदवार के फॉर्मूले पर लड़ना चाहिए। अगर ऐसे नहीं होता है तो भाजपा को हराना मुश्किल होगा। भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने के लिए कांग्रेस पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कदम बढ़ाया है। कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कि जिस तरह से 2004 में सोनिया गांधी ने बिखरे विपक्ष को एकजुट कर 'यूपीए' को सत्ता दिलाई थी, कुछ वैसा ही चमत्कार 2024 में भी हो सकता है। यही वजह है कि कांग्रेस ने अब 'कॉमन मिनिमम प्रोग्राम' पर जोर दिया है। जब दूसरे विपक्षी दलों ने कहा कि भाजपा सरकार ने विपक्ष के खिलाफ जांच एजेंसियों का भरपूर इस्तेमाल कर उन्हें प्रताड़ित किया है, तो सोनिया गांधी ने कहा, प्रधानमंत्री और उनकी सरकार लोकतंत्र के सभी तीन स्तंभों, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को व्यवस्थित रूप से ध्वस्त कर रही है। देश में 95 फीसदी राजनीतिक मामले सिर्फ विपक्षी नेताओं के खिलाफ दायर किए गए हैं। ऐसे में कांग्रेस पार्टी समान विचारों वाले दलों के साथ हाथ मिलाकर भारत के संविधान की रक्षा करने की हर संभव कोशिश करेगी।
आज की परिस्थितियां बदल चुकी हैं
कांग्रेस पार्टी की राजनीति को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक रशीद किदवई कहते हैं, ये बात ठीक है कि सोनिया गांधी ने पहले भी विपक्ष को एक साथ लेकर चलने की कोशिश की है। वे इसी प्रयास में लगी रही कि एक समान विचारधारा वाले सभी दल साथ आ जाएं। साल 2004 की राजनीतिक परिस्थितियों में विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ था। उस वक्त सोनिया गांधी ने विपक्ष को एकत्रित किया था। उसके बाद लगातार दस साल केंद्र में यूपीए की सरकार रही। साल 2014 में राजनीतिक स्थिति बदल गईं। पॉलिटिक्स में नए प्लेयर आ गए। अब सोनिया गांधी का वैसा राजनीतिक प्रभाव भी नहीं रहा। हालांकि वे प्रयासों में लगी हैं। उनकी रणनीति सटीक है। उन्होंने मल्लिकार्जुन खरगे को पार्टी अध्यक्ष बनाकर न केवल अपनी पार्टी के भीतर के असंतोष को शांत किया, बल्कि विपक्ष को भी एक संदेश दे दिया। विपक्ष के जो नेता किसी कारणवश राहुल गांधी को पसंद नहीं करते, मगर वे खरगे के साथ बातचीत करने में सहजता महसूस करते हैं। कुछ ऐसे भी नेता हैं, जिन्हें खरगे या राहुल की बजाए, सोनिया गांधी पर भरोसा है, वे वहां जाकर अपनी रख सकते हैं। मतलब, अब विपक्षी दलों को आपसी एकता के लिए कई विकल्प दे दिए गए हैं।
यहां पर भाभी देवरानी का रिश्ता काम आ जाएगा
कई बार अपने तीखे बयानों से विपक्षी दलों की एकता को हिलाने वाले नेता ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल को भी समझा लिया जाएगा, कांग्रेस नेताओं को ऐसी उम्मीद है। अगर केजरीवाल, राहुल गांधी से बात नहीं करना चाहते, तो वे खरगे से अपनी बात कह सकते हैं। यहां भी बात नहीं बनती तो डिनर के दौरान वे सोनिया गांधी से चर्चा कर सकते हैं। पटना की बैठक से पहले केजरीवाल चाहते थे कि दिल्ली की शक्तियों बाबत केंद्र द्वारा लाए गए अध्यादेश का कांग्रेस विरोध करे। कांग्रेस ने साफ कर दिया कि इस मुद्दे का जब नंबर आएगा, तब यह चर्चा करेंगे। कांग्रेस, अपने इस स्टैंड से पीछे नहीं हटी। कांग्रेस ने दो टूक कह दिया कि अभी तो साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर ही बात होगी। रही बात ममता बनर्जी की तो उन्हें लेकर कांग्रेस आश्वस्त है।
वजह, ममता बनर्जी और सोनिया के बीच हमेशा से सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं। गत विधानसभा चुनाव में जब दीदी ने जीत हासिल की, तो उसके बाद वे दिल्ली में सोनिया से मिली थीं। राजीव गांधी के समय से ही ममता और सोनिया के बीच मधुर संबंध रहे हैं। स्व. पीएम राजीव गांधी उन्हें अपनी छोटी बहन मानते थे। उन्होंने दीदी को यूथ कांग्रेस के महासचिव पद की जिम्मेदारी सौंपी। उन्हें मंत्री बनाया और मुसीबत के वक्त साथ दिया। नब्बे के दशक में जब ममता पर बेरहमी से हमला किया गया तो राजीव गांधी ने उनके इलाज की व्यवस्था की थी। वे कई दिनों तक वुडलैंड्स अस्पताल में भर्ती रहीं। गांधी परिवार ने उनकी खूब देखभाल की। इसके बाद उनके रिश्ते और ज्यादा मजबूत हो गए। राजीव गांधी की हत्या के बाद 1996 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ी थी। इसके बाद भी सोनिया के साथ उनके रिश्ते कायम रहे। अब विपक्षी एकता के मामले में जब सोनिया पहल करेंगी तो वे उनकी राह में बाधा नहीं बनेंगी।