पश्चिम एशिया में जंग को लेकर भारत सरकार की चुप्पी पर कांग्रेस के भीतर ही अलग-अलग राय सामने आई है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकार के रुख का बचाव करते हुए इसे जिम्मेदार कूटनीति बताया है, जबकि कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसी चुप्पी को जिम्मेदारी से पलायन करार दिया था।
अपने लेख में शशि थरूर ने कहा कि भले ही यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है और भारत के मूल सिद्धांतों संप्रभुता, अहिंसा और शांतिपूर्ण समाधान का उल्लंघन करता है, लेकिन विदेश नीति में केवल नैतिकता के आधार पर फैसले नहीं लिए जा सकते। उन्होंने कहा कि भारत को अपने राष्ट्रीय हित, रणनीतिक साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए संतुलित रुख अपनाना होता है। थरूर के मुताबिक, सरकार की चुप्पी कायरता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है, और कई बार बिना बयान दिए भी कूटनीतिक रास्ते खुले रखे जा सकते हैं।
वहीं, सोनिया गांधी ने अपने लेख में सरकार की चुप्पी पर कड़ा सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि ईरान के शीर्ष नेता की हत्या जैसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर भारत का मौन रहना तटस्थता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना है। उनके अनुसार, ऐसी घटनाएं वैश्विक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए गंभीर चुनौती हैं और भारत जैसे देश को इस पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
थरूर ने सोनिया गांधी और अन्य आलोचकों के विचारों से आंशिक सहमति जताते हुए यह जरूर कहा कि युद्ध उचित नहीं है, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार की आलोचना करना सही नहीं है, क्योंकि विदेश नीति में फैसले व्यावहारिक परिस्थितियों और दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति का हवाला देते हुए कहा कि भारत हमेशा से सिद्धांत और व्यवहारिकता के बीच संतुलन बनाता आया है और आज के दौर में मल्टी-अलाइनमेंट इसी सोच का विस्तार है।