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सियासत: केरल में फिर 'लाल सलाम', तो बंगाल में क्यों ढह गया किला, समझें दोनों राज्यों के 'लेफ्ट' का अंतर

Sun, 02 May 2021 03:12 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

केरल अब भी वामपंथी राजनीति का गढ़ बना हुआ है। राज्य में लगातार दूसरी बार सत्तारूढ़ एलडीएफ ने जीत का परचम लहराया है। वहीं बंगाल में वह लगातार हाशिये पर जा रहा है। सवाल यही है कि यह फर्क क्यों है? नेतृत्व में कमी है या रणनीति में? या कोई और कारण भी है जिम्मेदार?
 
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विस्तार
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विधानसभा चुनाव-2021 में बंगाल में वाम मोर्चा तीसरी बार पस्त हो गया है। 2011 में ममता बनर्जी ने वाम मोर्चे को उखाड़ा तो वह दोबारा उठ नहीं सका। वहीं केरल में वाम मोर्चे ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल कर कीर्तिमान बनाया है। जबकि यहां बारी-बारी से वाम मोर्चे यानी एलडीएफ व कांग्रेस नीत यूडीएफ की सरकार बनती रही है। ऐसा पहली बार हुआ कि वाम मोर्चे को लगातार दूसरी बार जीत मिली। 

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बंगाल में सिमटता जा रहा कुनबा
34 साल तक देश की राजनीति में वामपंथ के गढ़ रहे बंगाल से वाम दल का कुनबा लगातार सिमट रहा है।  हालत यह है कि कभी उसकी प्रतिद्वंद्वी रही कांग्रेस से हाथ मिलाने के बाद भी वह जीत हासिल नहीं कर सका। इस चुनाव में तो उसने 1997 के बाद पहली बार बहुत कम सीटों पर चुनाव लड़ा। कांग्रेस ने 92 सीटों पर तो वाम मोर्चे ने 165 पर चुनाव लड़ा और मुस्लिम वोट हासिल करने के इरादे से नवोदित पार्टी आईएफएस को 37 सीटें दीं। कुल 294 सीटों में से इस गठबंधन के खाते में इक्का-दुक्का सीटें जाती नजर आ रही हैं। इसकी मुख्य वजह यह मानी जा रही है कि वाम दल खुद ही अपने एजेंडे को कमजोर कर रहे हैं। 

2009 की हार से लिए गलत संदेश
बंगाल में वाम मोर्चे ने 1997 के बाद पहली बार 2009 में करारी हार का सामना किया था। तब तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस से गठजोड़ कर 42 में से 25 लोकसभा सीटें जीत ली थीं और वाम दलों के पास 2004 की 35 सीटों के मुकाबले सिर्फ 15 सीटें रह गई थीं। बंगाल के वाम मोर्चे में मुख्य रूप से चार दल-माकपा, भाकपा, अभा फारवर्ड ब्लॉक और आरएसपी हैं। ये सभी अपनी नीतियों व रणनीति में बदलाव नहीं करने के कारण सिमट रहे हैं। वहीं भाजपा ने राज्य में पूरी ताकत से उभर कर इनका सफाया कर दिया है। अब भाजपा प्रमुख विपक्षी दल बन गई है। कांग्रेस व वाम मोर्चे तो विपक्षी कहलाने लायक भी नहीं रहे। 
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केरल में विजयन का विजय अभियान जारी
बात करें, केरल की तो सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट दूसरी बार जीत की ओर है। जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट दूसरे स्थान पर है। यहां भाजपा भी कुछ बेहतर करती नजर आ रही है। हालांकि उम्मीद के अनुरूप उसे भी कामयाबी नहीं मिली है। राज्य में बीते 40 साल से कभी एलडीएफ व कभी यूडीएफ सरकार बनाते रहे हैं। इस बार मुख्यमंत्री पिनराई विजयन इतिहास रच रहे हैं। दरअसल केरल में सरकार ने हर मामले में तत्परता दिखाई है। चाहे अयप्पा मंदिर विवाद हो या सबरीमाला या पद्मनाथ मंदिर या कोरोना से निपटने के इंतजामों का। राज्य में बड़ी संख्या में मुस्लिम वोट हैं, उनका भी बिखराव नहीं होने दिया गया। बंगाल में टीएमसी के लिए मुस्लिम वोट बैंक बड़ा सहारा बना रहा। वह फुरफुरा शरीफ के मौलवी अब्बास सिद्दीकी की नवगठित आईएफएस से भी प्रभावित होकर बिखरा नहीं। 

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