वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी के अनुसार, गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद अगर भारतीय जनता पार्टी निर्दलीय उम्मीदवारों से संपर्क में है तो कुछ तो गड़बड़ है।
वो कहते हैं कि पूर्ण बहुमत मिलने के बाद तो राज्यपाल से मिलना चाहिए न कि निर्दलीय विधायकों से। ये संकेत हैं कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। वैसे भी भारतीय जनता पार्टी की जीत के नगाड़े मुंबई में तो खामोश ही रहे जबकि शिव सेना ने ठाकरे परिवार के राजकुमार माने जाने वाले आदित्य ठाकरे की जीत का जमकर जश्न मनाया।
वैसे अगर दोनों दलों की बात की जाए तो पहले वर्ष 1995 से लेकर 1999 तक शिव सेना बड़ा भाई था जबकि भाजपा छोटे भाई की भूमिका में थी। ये बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उस दौरान भी निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन से ही सरकार बनी थी। उस सरकार में शिव सेना के दो मुख्य मंत्री थे - पहले मनोहर जोशी बाद में नारायण राणे। उस विधानसभा चुनाव में शिव सेना को 73 सीटें मिली थीं जबकि भारतीय जनता पार्टी को 65। इसलिए निर्दलीयों का समर्थन सरकार के लिए महत्वपूर्ण था।
शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का दावा है कि उन्होंने अपने घटक दल यानी भाजपा के साथ गठबंधन के लिए तय शर्तों पर ही काम किया और 288 में से 124 सीटों पर चुनाव लड़ा। बाकी की सीटें भारतीय जनता पार्टी के लिए छोड़ दीं थीं। ये सब पहले से तय की गई गठबंधन की शर्तों के हिसाब से हुआ था। मगर वो कहते हैं कि अब छोटा भाई और बड़ा भाई जैसी कोई बात नहीं है और बराबर की भागीदारी से ही सरकार चल सकती है।
शिव सेना के इस रुख ने गठबंधन के भविष्य पर कुछ पुराने सवालों को फिर खड़ा कर दिया है। भाजपा नेता वैसे तो कुछ खुलकर नहीं कह रहे लेकिन सब कुछ ठीक होने का दावा कर रहे हैं। पार्टी की प्रवक्ता श्वेता शालिनी भी कहती हैं कि गठबंधन में सरकार बनाने को लेकर कोई रस्साकशी नहीं है।लेकिन कुछ नेता दबी जुबान से कह रहे हैं कि इस बार शिव सेना को मनाने में मुश्किल होगी क्योंकि ठाकरे परिवार से किसी ने पहली बार चुनाव लड़ा और जीता है। ऐसे में शिव सेना चाहेगी कि मुख्यमंत्री उनका भी हो। वो आदित्य ठाकरे की तरफ संकेत कर रहे थे जिन्होंने मुंबई के वरली विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीता है।
शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन एक 'स्वाभाविक गठबंधन' माना जाता रहा जो वर्ष 1986 से साथ मिलकर चुनाव लड़ते आये हैं। मगर 2014 के विधानसभा चुनावों में इन दोनों के बीच पहले से कोई गठबंधन नहीं हुआ। जो गठबंधन हुआ, वो चुनाव के बाद हुआ। इन चुनावों में भाजपा को 122 सीटें मिलीं थीं वहीं शिव सेना को 63 सीटें हासिल हुई थीं।
इस बार दोनों दलों ने मिलकर भी चुनाव लड़ा मगर दोनों को पहले की तुलना में कम सीटें मिलीं। जबकि प्रचार के दौरान भाजपा अकेले अपने दम पर 200 सीटें जीतने की बात कह रही थी। मौजूदा राजनीतिक हालात में विश्लेषकों को दो स्थितियां नजर आती हैं। पहला, 50:50 के फॉर्मूले पर भाजपा सहमत हो जाए। दूसरा, एनसीपी और निर्दलीय भाजपा को समर्थन दे दें। एनसीपी के भाजपा को समर्थन देने के आसार कम हैं। तीसरी सूरत में शिव सेना को एनसीपी और कांग्रेस समर्थन दे दें। मगर अब तक के राजनीतिक हालात में इसके आसार भी कम हैं।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक निखिल वागले के अनुसार ना तो एनसीपी ऐसा चाहेगी और ना ही कांग्रेस। क्योंकि दोनों के अपने अपने वोट बैंक हैं जो शिव सेना और भाजपा की विचारधारा से सहमति नहीं रहते। फिलहाल तो राजनीतिक रस्साकशी जारी है और ऐसा लग रहा है कि पूरी तस्वीर अब दीवाली के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी।