बिहार में बुधवार को पहले चरण के मतदान किए गए। पहले चरण में 1,066 में से 375 यानि कि 35 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति हैं। इनमें से एक प्रत्याशी की औसत संपत्ति दो करोड़ रुपये है। विदेशों से इसकी तुलना करें तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को एक साल में 1.44 करोड़ रुपये वेतन मिलता है।
भारत में राजनीति सबसे अच्छा निवेश क्यों?
राजनीति में नेताओं की संपत्ति दिन दोगुनी और रात चौगुनी गति से बढ़ती है। साल 2019 में दोबारा लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले भाजपा के 170 सांसदों की संपत्ति 13 करोड़ से 17 करोड़ बढ़ी। यही नहीं पिछले पांच सालों में शिरोमणि अकाली दल के दो नेताओं की संपत्ति 115 करोड़ रुपये तक बढ़ गई है।
वहीं एनसीपी के चार सांसदों की संपत्ति 102 करोड़ रुपये तक बढ़ गई है और कांग्रेस के 38 सांसदों की संपत्ति में औसतन 60 करोड़ रुपये की तेजी देखी गई है। नेताओं की संपत्ति में इतना इजाफा कैसे आया, इसके बारे में कोई नहीं जानता। राज्यसभा के 203 यानि कि 89 फीसदी सांसद करोड़पति हैं।
राज्यसभा में एक सांसद की औसत संपत्ति 67 करोड़ रुपये है। इसी तरह लोकसभा में 475 यानि कि 88 फीसदी सांसद करोड़पति हैं। यहां एक सांसद की औसत संपत्ति 93 करोड़ रुपये है। अगर देश में आम नागरिक के पास इतनी बड़ी रकम आ जाए तो आयकर विभाग की ओर से तुरंत कार्रवाई की जाती है लेकिन नेता इससे बच जाते हैं।
नेताओं की संपत्ति में इतनी फीसदी से इजाफा का एक कारण भ्रष्टाचार है। इसलिए अमेरिका, इंग्लैंड और भारत के भ्रष्टाचार में बहुत बड़ा अंतर है। करप्शन इंडेक्स की बात करें तो 198 देशों में अमेरिका 23वें नंबर पर है, वहीं इंग्लैंड 12वे नंबर पर और भारत 80वें नंबर पर है।
इस आंकड़े ये यह कहा जा सकता है कि भारत में बाकी देशों की तुलना में ज्यादा भ्रष्टाचार है। भारत में वंशवाद एक बड़ी समस्या माना जाता है। नेता का बेटा नेता, अभिनेता का बेटा अभिनेता और उद्योगपित का बेटा उद्योगपति बनेगा। लेकिन पश्चिमी देशों में ऐसा नहीं होता।
अमेरिका, यूके और कनाडा में लिस्टेड कंपनियों का मालिकाना हक निवेशकों के पास होता है। हालांकि भारत में बड़े-बड़े उद्योगपति अपने बच्चों को उनकी विरासत को आगे ले जाने की जिम्मेदारी सौंपते हैं। जब तक बच्चा आत्मनिर्भर नहीं हो जाता, तब तक माता-पिता उनकी जिम्मेदारी संभालते हैं.
हालांकि अमेरिका और इंग्लैंड में ऐसा नहीं है, वहां बच्चा 18 साल का होते ही आत्मनिर्भर हो जाता है। अमेरिका में 26 फीसदी, इंग्लैंड में 30 फीसदी और भारत में 55 फीसदी माता-पिता अपने बालिग बच्चों की आर्थिक मदद करते हैं।