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भीमा-कोरेगांव हिंसा: सभी आरोपी नजरबंद, सुप्रीम कोर्ट ने असहमति को बताया लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व

Wed, 29 Aug 2018 05:35 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार पांचों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत मिली। एफआईआर के नौ महीने बाद गिरफ्तारी पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोपियों को गिरफ्तार करने के बजाय मामले की अगली सुनवाई तक उनके घरों में ही नजरबंद रखा जाए। अगली सुनवाई 6 सितंबर को होगी। 

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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अंतरिम आदेश के तौर पर वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, वरनोन गोंजाल्विस और गौतम नवलखा को नजरबंद रखने का आदेश दिया। पीठ ने महाराष्ट्र सरकार सहित अन्य को मंगलवार तक जवाब दाखिल करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश इतिहासकार रोमिला थापर, देवकी जैन, प्रभात पटनायक, सतीश देशपांडे और माया दारूवाला की ओर से दायर याचिका पर दिया। 

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पीठ से कहा कि भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में नौ महीने पहले एफआईआर दर्ज हुई थी और इसमें इनके नाम नहीं थे। ये प्रोफेसर, वकील आदि नामचीन लोग हैं। ऐसे में जांच में इन सभी के सहयोग न देने की कल्पना करना बेमानी है। इन लोगों के किसी तरह के सबूत नष्ट करने की आशंका भी नहीं है। लिहाजा इन्हें जमानत दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर इस तरह से लोगों की गिरफ्तारी होगी तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। 
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याचिका में कहा गया है कि इस पूरे मामले की जांच निष्पक्ष एजेंसी से कराई जानी चाहिए। वहीं महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि याचिका गिरफ्तार होने वाले कार्यकर्ताओं की ओर से नहीं बल्कि अजनबी लोगों द्वारा दायर की गई है। साथ ही इन पांच लोगों में से कुछ को पहले भी गिरफ्तार किया गया था। 

असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व

मामले की सुनवाई के दौरान तीन सदस्यीय पीठ में शामिल जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि गिरफ्तार किए गए लोग प्रोफेसर, वकील आदि हैं। इनका कहना है कि सरकार असहमति वाले स्वर को दबाना चाहती है। असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है, अगर असहमति की इजाजत नहीं दी जाएगी तो लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व फट जाएगा। 

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