फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कानों देखी: 'मंगेतर का पता नहीं और मियां निकल पड़े शादी का कार्ड छपवाने'

Thu, 15 Apr 2021 01:51 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

असम विधानसभा चुनाव नतीजों के आने से पहले ही कांग्रेसी खेमे में मची हलचल, क्या बंगाल में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के 'खेल' में फंस गई है भाजपा और क्यों है केंद्र सरकार के अफसरों-कर्मचारियों को बेसब्री से लॉकडाउन और वर्क फ्रॉम होम का इंतजार, पढ़ें राजनीतिक जगत की गपशप हमारे विशेष कॉलम कानों-देखी में...
विज्ञापन
एआईयूडीएफ प्रमुख और सांसद मौलाना बदरुद्दीन अजमल (मध्य में) - फोटो : PTI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

असम में गौरव गगोई शांत हैं। सुष्मिता देव खुद को मुख्यमंत्री की रेस में नहीं मानती। बरदलोई और बोरा भी सीएम पद के दावेदारों में हैं। बताते हैं कांग्रेस पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री को लेकर कुछ नेताओं ने अभी से अपनी कसरत शुरू कर दी है। उन्हें लग रहा है कि इस बार राज्य में कांग्रेस की सरकार बनने वाली है। राज्य में मतदान के सभी चरण खत्म हो चुके हैं। 02 मई को नतीजा आना है। चुनाव में सफलता पाने के लिए प्रभारी महासचिव जितेन्द्र सिंह, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। बताते हैं दूसरी तरफ बदरुद्दीन अजमल को भी इस बार अच्छी सफलता मिलने की उम्मीद है। सरकार बनने की संभावना और भाजपा की तोड़-फोड़ की राजनीति से डरकर कांग्रेस ने नतीजा आने से पहले ही अपने प्रत्याशियों तक को सुरक्षित जोन में पहुंचाना शुरू कर दिया है। ठीक ही कहा गया है कि मंगेतर का पता नहीं और मियां शादी का कार्ड छपवाने निकल पड़े।

विज्ञापन

कर्मचारी, अधिकारी तो चाह रहे हैं कि लाकडॉउन हो जाए, लेकिन संक्रमण का खौफ नहीं

कोविड-19 ने कितने बदल दिए हालात, अब तो सरकारी विभागों के कर्मचारी खुद बड़ी बेसब्री से लॉकडाउन और वर्क फ्रॉम होम की बाट जोह रहे हैं। लेकिन सरकार है कि दफ्तरों को खोलकर बैठी हुई है। उद्योग भवन, निर्माण भवन के तमाम कर्मचारी और अधिकारियों को लग रहा है कि दिल्ली में करोना बढ़ गया है। इस बार खतरा ज्यादा है, सरकार को लॉकडाउन लगा देना चाहिए। लेकिन सरकार उद्योगपतियों, कारोबारियों के दबाव में निर्णय नहीं ले पा रही है। हालांकि एक सच यह भी है कि इन कर्मचारियों, अधिकारियों में कोविड संक्रमण को लेकर न तो कोई खास डर दिखाई दिया, न पिछले साल जैसी संवेदनशीलता। पिछले साल का जुलाई-अगस्त खूब याद आता है। संयुक्त सचिव, निदेशक, उपनिदेशक स्तर के अधिकारी भी लोगों से मिलने में कतराते थे। उद्योग भवन में सितंबर महीने में एक डिप्टी सेक्रेटरी के चेहरे पर कोविड को लेकर संवेदनशीलता साफ दिखाई दी थी, लेकिन अप्रैल 2021 में इस तरह के हालात नहीं हैं। यहां तक कि तमाम कर्मचारी और अधिकारी मास्क गले में लटकाए मिल जाएंगे।

क्या नेताओं ने उठा दिया कोविड व्यवहार से भरोसा?

क्या देश की जनता का कोविड व्यवहार से भरोसा उसके लोकप्रिय प्रधानमंत्री ने ही उठा दिया? केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री के सचिवालय से जुड़े सूत्र इस सवाल पर मुस्कराकर चुप हो जाते हैं। एक निदेशक स्तर के अधिकारी ने बताया कि फेसबुक, ट्विटर, सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर इसका जवाब है। वह बता ही रहे थे कि उनके एक सहयोगी ने बीच में रुचि दिखाते हुए कहा बंगाल चुनाव में देख लीजिए न, हर रोज जनसभा हो रही है। प्रधानमंत्री और दूसरे नेताओं की भी भीड़वाली सभाएं हो रही हैं। हजारों लोग इकट्ठा हो रहे हैं। तो जनता को कैसे मास्क पहनाकर दो गज की दूरी पर रखा जाए। आखिर कहां-कहां हाथ धुलवाएं? फिर अब तो वैक्सीन भी आ गई है। चर्चा चल ही रही थी कि एक साहब ने और एंट्री की। उन्होंने कोविड संक्रमण को लेकर मंत्रियों के समूह का जिक्र छेड़ दिया। इस समूह के अध्यक्ष संवेदनशील स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्ष वर्धन हैं। वह लगे बताने कि मंत्रियों के समूह ने चर्चा तो कर ली, लेकिन निर्णय प्रधानमंत्री के भाषण वाला ही हुआ। मंत्रियों ने निर्णय लिया कि लोगों से कोविड-19 व्यवहार का पालन कराए जाए। लोग मास्क लगाएं, हाथ धोएं, दो गज की दूरी बनाएं।
विज्ञापन

क्या भाजपा को उल्टा पड़ने लगा है प्रशांत किशोर का 'खेला होबै'

सुनी-अनसुनी कुछ इसी तरह की है। बताते हैं भाजपा आईटी सेल के अमित मालवीय चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ और बंगाल में भाजपा से जुड़ी वॉयस क्लिप को तेजी से लेकर आए थे। भाजपा ने भी आक्रामक रुख कर लिया था और दो बड़े नेताओं ने समय से मुद्दे को उठाने के लिए बधाई दे दी थी। सही समय इसलिए भी कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रभाव वाले तीन चरणों में मतदान भी हो चुका था, लेकिन अब भाजपा और केन्द्र सरकार के कुछ रणनीतिकारों को यह पूरा मामला उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। बताते हैं किसी को उम्मीद नहीं थी कि सभी समाचार चैनल वाले इस तरह से प्रशांत किशोर से सफाई मांगने लगेंगे। प्रशांत किशोर के लिए भी यह इज्जत और प्रोफेशन से जुड़ा मामला है, लिहाजा वह भी खुलकर अपना पक्ष रखने लगे हैं। हालांकि भाजपाई कह रहे हैं कि प्रशांत किशोर इज्जत बचाने के लिए कुछ तो कहेंगे ही, उन्हें कहने दीजिए। लेकिन प्रशांत किशोर के वोटिंग और पश्चिम बंगाल के सामाजिक समीकरण को सामने रखने बाद भाजपा के नेता चाहते हैं कि यह चैप्टर जितना जल्दी बंद हो जाए, उतना ही अच्छा है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें