भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी का...भोजपुरी में रिंकिया के पापा वाला गाना मशहूर है।अब दिल्ली विधानसभा चुनाव का नतीजा आ गया है तो रिंकिया के पापा की भी मुसीबत बढ़ गई है। तिवारी विनम्रता दिखाकर और पहले ही हार की जिम्मेदारी लेकर चतुराई भरा पासा फेंक चुके हैं। मगर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इतने से मानने वाला नहीं है।
कांग्रेस पार्टी में इस समय वैचारिक घमासान जोरों पर है। युवा ब्रिगेड तीर कमान लेकर खड़ी हो गई है। बताते हैं राजस्थान के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट गुस्से में हैं। वह कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के लगातार संपर्क में है।
जेपी नड्डा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं। संगठन की राजनीति को गहराई से समझने वाले जगत प्रकाश नड्डा की व्यावहारिक परेशानी यह है कि भाजपा के नेता उनसे ज्यादा गृहमंत्री अमित शाह से मिलने के लिए चक्कर काट रहे हैं।
दरअसल पार्टी के नेताओं को लग रहा है कि नड्डा जी भले अध्यक्ष बन गए, लेकिन होगा वही जो पुराने अध्यक्ष जी चाहेंगे। पश्चिम बंगाल के नेताओं का भी यही हाल है। बिहार के भाजपा नेताओं का भी यही हाल है। दूसरी बड़ी चुनौती संगठन को लेकर है। सभी पदाधिकारी पुराने अध्यक्ष जी के समय के हैं। इन्हें हटाना, बदलना सब कुछ बहुत आसान नहीं है।
तीसरी बड़ी चुनौती पार्टी के जनाधार को बढ़ाना, सदस्य संख्या को बढ़ाना और आगामी राज्यों में विधानसभा चुनाव जितवाना है। बताते हैं बारीकी से काम करने वाले नड्डा के पास सभी संकटों से निपटने का उपाय है। बस सबसे बड़ा संकट यह है कि वह स्वतंत्र होकर काम करने की तरकीब कैसे तैयार करें। यही सबसे बड़ा संकट है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भले ही केंद्रीय गृहमंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह ने अपने नेताओं के बिगड़े बोल से किनारा कर लिया हो, लेकिन इस तरह की भाषणबाजी कम नहीं होने वाली है।
भाजपा के एक महासचिव को इसमें कुछ भी गलत नहीं लग रहा है। एक अन्य नेता का कहना है कि भाजपा में लोगों की कई स्तर पर ट्रेनिंग होती है। चुनाव प्रचार अभियान में वालेंटियर और राज्यों के कार्यकर्ता भी होते हैं। वह अपने प्रशिक्षण और समझ के आधार पर चुनाव प्रचार करते हैं।
सूत्र का कहना है कि यह विचारधारा की लड़ाई है और इसे कैसे रोका जा सकता है। सूत्र का कहना है कि आप दिल्ली विधानसभा चुनाव को लोकसभा चुनाव 2019 से मत जोड़िए। विधानसभा चुनाव राज्य के मुद्दे पर लड़ा जाता है। प्रधानमंत्री हमारे सबसे लोकप्रिय नेता हैं, हम उनके चेहरे पर चुनाव लड़ते हैं, लेकिन इसके साथ अन्य फैक्टर भी होते हैं।
बताते हैं दिल्ली में पिछले विधानसभा चुनाव से भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा है। विधायकों की संख्या बढ़ी है। केवल भाजपा और आम आदमी पार्टी में मुकाबला हुआ है और हमारे प्रत्याशियों का हार का अंतर बहुत कम रहा है। पिछली बार की तुलना में दो दर्जन सीटों पर यह बहुत ही कम है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल सिंह यादव भतीजे के निमंत्रण का इंतजार कर रहे हैं। मुलायम सिंह यादव भी चाहते हैं कि मामला जल्दी से निपट जाए ताकि प्रदेश भर के समाजवादी समय रहते इकट्ठा हो सके। अखिलेश यादव की टीम इस परिस्थिति का अपने हिसाब से अभी भी गुणा-भाग कर रही है। उसे लग रहा है कि धीरे-धीरे शिवपाल सिंह यादव राजनीति की बाउंड्री के बाहर की तरफ जा रहे हैं। प्रोफेसर राम गोपाल यादव भी स्थिति पर निगाह लगाए हैं। बताते हैं इस घटनाक्रम पर निगाह तो मुख्यमंत्री योगी, बसपा प्रमुख मायावती की भी है, लेकिन अभी कोई प्रगति 2021 में होगी क्योंकि चुनाव 2022 में है। तब तक सब कुछ इसी तरह से चलता रहेगा।
बसपा प्रमुख मायावती के सामने भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर लगातार बड़ी मुसीबत बनते जा रहे हैं। मायावती को अब यह खबर मिलने लगी है कि सहारनपुर से लेकर प्रदेश के दूसरे हिस्सों और अन्य राज्यों में भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर की फालोइंग बढ़ रही है। स्कूल, कालेज में पढ़ रहा युवा चंद्रशेखर की क्रांतिकारी राजनीति से तेजी से प्रभावित हो रहा है।
बसपा के एक नेता का भी मानना है कि यू-ट्यूब, सोशल मीडिया पर भी चंद्रशेखर काफी देखे जा रहे हैं। इससे बड़ी चौंकाने और हैरान करने वाली बात है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी चंद्रशेखर से लगातार संपर्क बनाए रखती हैं। वैसे भी दिल्ली में बसपा ने बहुत खराब प्रदर्शन किया है।
मध्य प्रदेश में भी उसकी स्थिति पहले से खराब हुई है। राजस्थान में उसके विधायक कांग्रेस में चले जाते हैं। पार्टी की आर्थिक स्थिति भी लगातार गिर रही है। ऐसे में बसपा सुप्रीमो को अब पार्टी के जनाधार की चिंता सताने लगी है। बताते हैं इसके साथ-साथ दूसरी मुसीबत भी है। वह चाहकर भी सरकारों पर पहले की तरह खुलकर राजनीतिक हमला नहीं कर पा रही हैं। किसी ने सही कहा है, जब हाथ बंधे हो तो जनता के विश्वास का ही भरोसा रह जाता है।
पुरानी कहावत है कि अंधा पीस रहा था और कुत्ता आटा खा गया। यूपी के कांग्रेसी नेता इस समय इस कहावत से फिर परेशान हैं। उनकी परेशानी का हालांकि एक कारण और है। प्रियंका गांधी की टीम में कोई वामपंथी सोच का घुस आया है।
वह यूपी कांग्रेस पार्टी से ब्राह्मण चेहरों को रह-रहकर टारगेट कर रहा है। जबकि रणनीतिकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी के ठाकुरवाद से निराश ब्राह्मण कांग्रेस का वोटबैंक बनने वाले हैं। राज्य में दस प्रतिशत से अधिक हैं भी। दूसरी बड़ी समस्या है कि प्रियंका गांधी वाड्रा यूपी में लगातार सरकार विरोधी लहर पैदा करने के लिए जमीन तैयार कर रही हैं।
कड़ी मेहनत कर रही हैं और बार-बार, लगातार यूपी दौरे पर हैं। कांग्रेसियों का डर है कि कहीं कमजोर संगठन, पुराने ब्राह्मण समेत अन्य नेताओं से दूरी, वामपंथ की चल रही लाइन का कांग्रेस को नुकसान न उठाना पड़ जाए। सरकार विरोधी लहर कांग्रेस खड़ी करे और फायदा समाजवादी पार्टी या बसपा उठा ले जाए?