अगले साल राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने हैं। सपने पूरे करने के लिए समय बहुत कम है। सचिन पायलट के लिए भी और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए भी। वसुंधरा जान लेना चाहती हैं कि राजस्थान में उनकी भूमिका क्या रहने वाली है। इसके लिए वह पिछले कुछ दिनों में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से तीन बार मिल चुकी हैं। शायद अभी पत्ते खुले नहीं हैं। बड़ी उम्मीद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया को है और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत पहले से ही केंद्रीय नेतृत्व के करीबियों में गिने जाते हैं। भाजपा के रणनीतिकारों को लग रहा है कि स्विंग स्टेट होने के कारण पांच साल के लिए सत्ता उनके पास आनी है। वसुंधरा के विरोधी इसी आभास में चैन की सांस ले रहे हैं। दूसरी तरफ वसुंधरा के लिए करो या मरो जैसी स्थिति है। यानी अब मत चूक चौहान। लिहाजा तेजी से पत्ते फेंट लेना चाहती हैं।
प्रधानमंत्री मोदी दो दिन पहले पटना गए थे। राजनीति के चतुर खिलाड़ी प्रधानमंत्री पूरी शालीनता से वहां एक और पारी खेल आए। पहले वह झारखंड गए। वहां मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उनके स्वागत में मीडिया में विज्ञापन भी दिया था। इसके बाद आजादी के अमृत महोत्सव और विधानसभा का शताब्दी वर्ष समारोह के सिलसिले में वह पटना पहुंचे। वहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री के स्वागत में कोई विज्ञापन नहीं दिया गया। चलते-चलते प्रधानमंत्री नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और उनके पिता का हालचाल पूछ लिया। तेजस्वी यादव को वजन कम करने की अभिभावक जैसी सलाह भी दे आए। इसके कुछ दिन पहले भी प्रधानमंत्री ने तेजस्वी यादव को फोन करके पूर्व मुख्यमंत्री और उनके पिता लालू यादव के स्वास्थ्य की जानकारी ली थी। लालू प्रसाद यादव को एम्स, दिल्ली में दाखिल करवाने से लेकर, एयर एम्बुलेंस से दिल्ली लाने का रोड-मैप बनाया था। प्रधानमंत्री की इस सज्जनता की बड़ी चर्चा है।
दरअसल बिहार भाजपा और जद(यू) में सब ठीक नहीं चल रहा है। कुछ समय से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी दल राजद से रिश्ता मधुर बनाने का खेल खेलने लगे हैं। भाजपा मुख्यमंत्री की दिक्कतें बढ़ाती हुई दिखती है तो मुख्यमंत्री कई बार कई तरीके से भाजपा पर दबाव बनाते नजर आते हैं। इधर महाराष्ट्र में शिवसेना की बगावत के बाद मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी के विधायकों, सहयोगियों पर भी ध्यान देना शुरू किया है। ताकि उनके दल से भी कोई एकनाथ शिंदे पैदा न हो जाए। ऐसे में प्रधानमंत्री के दौरे में फेंकी गई राजनीतिक गोट को काफी अहम माना जा रहा है।
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में बड़ी हलचल है। हलचल की वजह भी है। गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा काफी सक्रिय रहते हैं। ग्वालियर महाराज और केंद्र सरकार में मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का मध्यप्रदेश से लगातार गहरा लगाव रहा है। ज्योतिरादित्य के सामानांतर प्रदेश की जनता के मामा (मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान) इस बार कमलनाथ से छीनी कुर्सी पर बैठने के दिन से ही सशंकित चल रहे हैं। भोपाल के सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री के पास तरह-तरह के संदेश पहुंचते रहते हैं, लेकिन उनके राजनीतिक कौशल के आगे सब फीका चल रहा है। ताजा सूचना यह है कि शिवराज सिंह चौहान अपने ही नेतृत्व में अगले विधानसभा चुनाव तक बने रहना चाहते हैं। दिल्ली भी अपनी कोशिश में जुटी है। गुजरात विधानसभा चुनाव तक कुछ सुनने को मिल सकता है। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के ताज को लेकर ग्वालियर के महाराज की महत्वाकांक्षा पुरानी है। अब यह महत्वाकांक्षा इसलिए तेजी से बढ़ भी रही हैं कि क्योंकि भाजपा ने महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व की सरकार को मंजूरी दी तो असम में हिमंत बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री हैं।
सुभासपा के नेता ओमप्रकाश राजभर नया गुल खिलाने चले थे, लेकिन झटका खा गए। उनकी पार्टी के एक बड़े नेता शशि प्रताप सिंह ने बागी होकर राष्ट्रीय समता पार्टी का गठन कर लिया है। राजभर की पार्टी जितनी छोटी है, उनकी चतुराई उतनी ही बड़ी रहती है। उत्तर प्रदेश चुनाव खत्म होने के तुरंत बाद ही वह मंत्री और भाजपा के नेता दया शंकर सिंह, भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह समेत कुछ अन्य से मिल आए थे। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की भी उनपर नजर थी। इधर राजभर को दिल्ली से भाजपा के एक बड़े नेता ने डोरे डालकर उन्हें उलझाए रखा है। इसी प्रेम में राष्ट्रपति चुनाव में उनकी पार्टी ने एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करने की घोषणा कर दी है। राजभर और उनकी पार्टी का कोर वोटर अपने दबदबे वाली विधानसभा में भी 30-35 हजार से ज्यादा नहीं है। इसलिए काम किसी बड़े दल के बिना नहीं चल सकता। जब राजभर को लगा था कि सपा सत्ता में आ सकती है तो उसके साथ हो गए थे। अब वह फिर नए ठिकाने की तलाश में हैं। वहीं अखिलेश भी राजभर की राजनीतिक हैसियत समेटने की तैयारी कर रहे हैं।
केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने प्रधानमंत्री मोदी से मिलने के लिए समय मांगा है। जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा भी अपने अभियान में सफल नहीं हो पाए हैं। दिल्ली आए थे, लौट गए। सप्ताहांत में फिर दिल्ली में उनके होने की संभावना जताई जा रही है। जम्मू कश्मीर के राज्यपाल का एजेंडा कुछ और है। आरिफ मोहम्मद खान का मकसद दूसरा है। एक पूर्व केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी भी हैं। आस बाकी है, बाकी नाउम्मीद हैं। नाउम्मीदी के भी अपने कारण हैं। भाजपा ने न तो राज्यसभा का टिकट दिया और न लोकसभा के लिए टिकट मिलने की संभावना थी। ऊपर से रामपुर से उम्मीदवार घनश्याम लोधी को जिताने का दायित्व जरूर मिल गया था। ऐसे में नकवी की भी छटपटाहट बढ़ रही है। आखिर कुछ तो रोजगार मिलना चाहिए। इन सबसे अलग स्थिति वेंकैया नायडू की है। अभी उपराष्ट्रपति उम्मीदवार की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन उपराष्ट्रपति के कुछ करीबियों ने अभी से बोरिया बिस्तर बांधना शुरू कर दिया है। मानो उन्हें अहसास हो कि वेंकैया को दूसरा कार्यकाल नहीं मिलेगा।
उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले अखिलेश यादव कहते थे कि चाचा शिवपाल का पूरा सम्मान होगा। चाचा ने सम्मान में पाए केवल जसवंत नगर की सीट को अंदर से गुल खिला दिया। चाचा के कई करीबियों ने दूसरे दलों के टिकट पर या निर्दलीय लड़कर सपा उम्मीदवारों को हरा दिया। इसके बाद चच्चा को उम्मीद थी कि विधानसभा में नेता विरोधी दल मिल सकता है, क्योंकि अखिलेश लोकसभा सांसद भी थे। लेकिन अखिलेश ने आजमगढ़ की लोकसभा सीट छोड़ दी, तो चाचा को फिर उम्मीद बंधी, लेकिन सारे अरमान ताश के पत्ते की तरह ढह गए। अब वह फिर से अपनी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी खड़ी करना चाहते हैं। कह भी रहे हैं कि अखिलेश ने उनका मान रखा होता तो वह आजमगढ़ हारने न देते। वहीं चच्चा के ऐसे दावों पर टीम अखिलेश कहती है कि वह तो केवल मुलायम सिंह यादव के बार-बार कहने के कारण पार्टी में लिए गए हैं। यह पहले से पता था कि साथ छोड़ेंगे। इसीलिए तो राष्ट्रीय अध्यक्ष ने उनके साथ लगातार संभलकर व्यवहार किया है।