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त्वरित टिप्पणी: ‘लाल’ का ‘भगवा’ हो जाना, क्या वामपंथ खत्म हो गया?

Sat, 03 Mar 2018 04:19 PM IST
अतुल सिन्हा, नई दिल्ली
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आखिर ‘माणिक’ का असर खत्म हो गया और त्रिपुरा को बकौल नरेंद्र मोदी एक नया ‘हीरा’ मिलने जा रहा है। अपनी चुनावी सभाओं में प्रधानमंत्री मोदी के इस माणिक वाले जुमले ने जोरदार असर दिखाया और पहली बार उत्तर-पूर्व के इस लाल प्रदेश को भगवा में बदल डाला। इस सवाल पर बहस अब बेमानी है कि माणिक सरकार ने क्या किया, क्या नहीं किया या त्रिपुरा को विकास की दौड़ में काफी पीछे धकेल दिया, अब जनता के ताजा फैसले ने यह बहस जरूर छेड़ दी है कि वामपंथ का अस्तित्व क्या वाकई अपने देश में खत्म हो गया? जिस विचारधारा, जीवनशैली और ईमानदारी की बात वामपंथ करता रहा है और धीरे धीरे अपनी जमीन खोता रहा है, क्या आज उसकी प्रासंगिकता पूरी तरह खत्म हो गई है?
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बेशक उत्तर भारत में हाल ही में हुए कुछ उप-चुनावों के नतीजों से विपक्ष की थमती सांसें फिर से चलने लगी हैं। लेकिन मोदी मैजिक और भगवा लहर का जो असर उत्तर-पूर्व भारत में दिख रहा है, उससे देश के मानचित्र पर 21 राज्य भगवा रंग से रंग गए हैं। अगर इस खुशी में यूपी के भगवा मुख्यमंत्री योगी अपने चुनाव प्रचार का भी असर मानते हैं, तो इसमें गलत क्या है। बीजेपी के स्टार प्रचारक रहे योगी ने त्रिपुरा की अपनी सातों सभाओं में विकास की बात करने के साथ लाल आतंक को खारिज करते हुए वहां के लोगों से नया त्रिपुरा बनाने की जो अपील की थी, वो रंग लाई।

दरअसल सियासत और सत्ता की इस जंग में अगर भाजपा साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना कर देश के हर हिस्से पर अपना कब्जा कर रही है तो आप इसे गलत कैसे ठहरा सकते हैं। विचारधारा और कार्यशैली को लेकर आपकी असहमतियां हो सकती हैं लेकिन जब आप चुनावी राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं तो आप भी उसी रणनीति और चिंतन के शिकार हो जाते हैं। बात अंतत: जनता के फैसले पर आकर टिक जाती है।
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ऐसे में वामपंथी पार्टियां हर बार की तरह इस बार भी ‘आत्मचिंतन’ और ‘आत्ममंथन’ करेंगी, अपनी गलतियां तलाशने की बजाय भाजपा की कॉरपोरेट संस्कृति और सांप्रदायिकता की राजनीति पर हमले करेंगी और खुद को दीन-हीन, गरीब और आम लोगों की असली हितैषी बताएंगी, लेकिन अपने कैडर को बचाने, कामकाज के विस्तार और वैचारिक लड़ाई में आम लोगों को साथ जोड़ने का कोई कारगर फार्मूला निकाल पाने में नाकाम रहेंगी। साथ ही कांग्रेस और समाजवादियों की पिछलग्गू बनी रहेंगी। कभी कांग्रेस के खिलाफ भाजपा से मिलकर मोर्चा बनाने वाली वामपंथी पार्टियां अब भाजपा के खिलाफ कांग्रेस के साथ मिलकर ‘गठबंधन’ और ‘महागठबंधन’ बनाने की बात करेंगी।
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त्रिपुरा की हार के कई मायने हैं

त्रिपुरा की हार के कई मायने हैं। यहां भाजपा का वोट प्रतिशत करीब करीब 500 फीसदी बढ़ा है और इसका अगर पूरा श्रेय किसी को जाता है तो वह है वहां संघ के जमीनी स्तर पर किए जा रहे कामकाज और लगातार फैलता जनाधार। संघ ने यहां बेहद सुनियोजित तरीके से उन इलाकों में अपना विस्तार किया, जिसे वामपंथियों का गढ़ माना जाता रहा है। यहां तक कि वामपंथियों के परिवारों में जाकर उनकी मदद करके और उन्हें भावनात्मक रूप से अपने साथ जोड़ने का काम भी संघ ने बखूबी किया।

उस पर केंद्र में भाजपा की सरकार और विकास के खूबसूरत सपनों के साथ किसी प्रधानमंत्री का बार बार वहां जाना, उत्तर-पूर्व के लिए लुभावने पैकेज देना और यह बताना कि नार्थ-ईस्ट के लोग खुद को मुख्यधारा से अलग न मानें। और तो और तमाम स्टार प्रचारकों के साथ ऐसा चुनाव कम से कम इन तीनों राज्यों ने पहले कभी नहीं देखा था। जाहिर है यहां के लोगों ने उम्मीद से भरकर इस बार यह प्रयोग किया है और भाजपा पर अपना भरोसा जताया है।

इन नतीजों से साफ है कि 2019 के लिए भाजपा ने अपनी एक मजबूत जमीन यहां तैयार कर दी है और अब पूरी रणनीतिक तैयारी के साथ उसका निशाना कर्नाटक को हासिल करना है। उड़ीसा को लेकर भी पार्टी आश्वस्त है। छत्तीसगढ़ में भी फिलहाल उसे फिर से सत्ता पा लेने का भरोसा है। लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान बचा पाना उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में 2019 के लिए जो तस्वीर उभर रही है उससे यह तो लगने ही लगा है कि भाजपा के लिए दोबारा सत्ता हासिल करना बेहद आसान होता जा रहा है। इससे कांग्रेस या विपक्ष कितना सबक सीखेगा और अपनी रणनीति में क्या बदलाव लाएगा, देखने वाली बात होगी।
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