वैसे तो हमारे प्यारे देश में चटपटी खबरों, दिल दहला देने वाली घटनाओं और विवादों को जन्म देने वाले बयानों की कभी कोई कमी नहीं रही, लेकिन इन दिनों ऊपर वाला बरसात और खबरों को लेकर भारत पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है।
अपनी विदेश यात्रा में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से करने वाले राहुल गांधी के बयान या 1984 की सिख विरोधी हिंसा को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा अपनी पार्टी के बचाव का मुद्दा हो नोटबंदी पर रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के बाद सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर हुई कांग्रेस और नोटबंदी व राफेल को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मोदी पर सीधा हमला करके कैलाश यात्रा पर रवाना हो जाना और जवाब में भाजपा का राहुल की कैलाश यात्रा पर सवाल उठा देना और अर्थव्यवस्था की सुस्ती के लिए नोटबंदी की बजाय पूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हुए नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का मैदान में उतर आना जैसी तमाम सुर्खियां चर्चा में हैं।
इनके अलावा केंद्रीय मंत्री अश्वनी चौबे का राहुल गांधी की तुलना नाली के कीड़े से करना, मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जन आशीर्वाद यात्रा पर कई जगह चप्पल और पत्थर फेंका जाना, कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ को काले झंडे, कर्नाटक नगर निगम चुनावों में कांग्रेस की भाजपा पर बढ़त जैसी खबरें भी ध्यान खींचती हैं। जर्मनी और इंग्लैंड की यात्रा में राहुल गांधी ने आरएसएस को लेकर जो बयान दिया उसे कांग्रेस अध्यक्ष का बचकाना पन माना जाए या उनकी दूरगामी राजनीति का एक दांव। यह मानने का काई कारण नहीं है कि राहुल ने संघ की तुलना कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से अनजाने में या बचकाने पन में की। क्योंकि राहुल गांधी ने यह बयान यूं ही नहीं दिया।
दरअसल राहुल गांधी देश की राजनीति को सीधे सीधे आरएसएस विचारधारा बनाम कांग्रेस की विचारधारा के बीच विभाजित करने की कोशिश कर रहे हैं जो पिछले कुछ वर्षों में न सिर्फ धुंधली पड़ गई है बल्कि लगभग मिट सी गई है। नेहरू के जमाने से ही कांग्रेस आरएसएस और उसके आनुषांगिक संगठन भाजपा की राजनीति को दक्षिणपंथी कट्टरवादी विचारधारा का प्रतिनिधि मानती रही है और इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक कांग्रेस देश की राजनीति को आरएसएस की कट्टरवादी हिंदुत्व राजनीति के विरोध में खुद को एक धर्मनिरपेक्ष और समावेशी राजनीतिक विचारधारा की पार्टी के रूप में पेश करती रही है। लेकिन 1980 के उत्तरार्ध में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के राजनीतिक प्रयोग जिसमें भाजपा और वामदल दोनों शामिल थे, देश की राजनीति की मुख्यधारा में संघ की हिंदुत्ववादी राजनीति को स्वीकार्यता दी।
इसके बाद जार्ज फर्नांडीस, नीतीश कुमार, शरद यादव, चंद्रबाबू नायडू, ममता बनर्जी, कांशीराम, मायावती, करुणानिधि, जयललिता, नवीन पटनायक, देवेगौड़ा, फारुख अब्दुल्ला, मुफ्ती सईद, जैसे अनेक हिंदुत्व विरोधी धारा के नेताओं ने समय समय पर अपने हिसाब से भाजपा के साथ दोस्ती करके राजनीति से संघ बनाम गैर संघ की वैचारिक विभाजन रेखा को मिटा दिया। राहुल गांधी अब उस रेखा को एक बार फिर से मजबूत करके देश की राजनीति का वैचारिक ध्रुवीकरण संघ बनाम गैर संघ के बीच करने की कोशिश कर रहे हैं और उनकी कोशिश है कि आरएसएस के मुखर और प्रखर विरोधी के रूप में कांग्रेस एक मजबूत ध्रुव बने और राहुल अपनी छवि एक एसे नेता के रूप में पेश कर रहे हैं जो संघ की हिंदुत्व की कट्टरवादी विचारधारा के खिलाफ देश की सर्वधर्म समभाव और धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को बचाने के लिए मजबूती से लड़ रहा है। अब राहुल इसमें कितने कामयाब होते हैं, यह तो वक्त के साथ पता चलेगा, लेकिन समय समय पर आरएसएस के खिलाफ उनके बयान उनकी इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
राहुल की इसी राजनीति में इस सवाल का जवाब भी छिपा है कि क्या सितंबर में दिल्ली में होने वाले संघ के कार्यक्रम में अगर न्यौता मिला तो क्या राहुल गांधी उसमें जाएंगे। राहुल जब देश की राजनीति को ही कांग्रेस बनाम संघ के ध्रुवीकरण पर ले जाना चाहते हैं तो वह संघ के कार्यक्रम में जाकर अपनी रणनीति को कुंद क्यों करेंगे। इसीलिए कांग्रेस कोर ग्रुप ने राहुल को कार्यक्रम में न जाने की सलाह देते हुए वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरएसएस को जहर तक बता दिया।
अब बात लंदन में राहुल गांधी द्वारा 1984 की हिंसा पर दुख प्रकट करते हुए भी कांग्रेस के बचाव की। राहुल के इस बयान पर देश में जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई। हमेशा की तरह भाजपा और अकाली दल ने फौरन कांग्रेस और राहुल गांधी को आड़े हाथों लिया। हालाकि 1984 को लेकर राहुल गांधी एक बार अपनी साफगोई की वजह से 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले फंस चुके हैं। जब उन्होंने अपने एक घोर आलोचक टीवी चैनल के पत्रकार को अपना पहला इंटरव्यू देकर यह कह दिया था कि 1984 की हिंसा में कांग्रेस के कुछ लोग शामिल थे। तब राहुल की साफगोई की यह कहकर आलोचना हुई थी कि उन्हें यह नहीं कहना चाहिए था। एसा कहकर उन्होंने विरोधियों के आरोपों को सही साबित कर दिया।
अब राहुल की आलोचना यह कह कर की गई कि वह अपनी पार्टी का बचाव क्यों कर रहे हैं। क्या हम यह अपेक्षा करें कि राहुल गांधी जो अब कांग्रेस अध्यक्ष हैं उनसे जब सवाल पूछा जाएगा 1984 की हिंसा को लेकर तो क्या वह कह दें कि कांग्रेस उसमें शामिल थी। क्या यह अपेक्षा हम 2002 की गुजरात हिंसा को लेकर किसी भी भाजपा अध्यक्ष से कर सकते हैं। क्या इसी तरह की अपेक्षा हम पंजाब में आतंकवाद की हिंसा के शिकार हुए हिंदुओं की हत्याओं को लेकर अकाली दल के उन नेताओं से कर सकते हैं जो आतंकवादियों के महिमा मंडन से लेकर उनके भोग समारोहों तक में शामिल होते रहे हैं और आज तक पंजाब में आतंकवादी हिंसा के शिकार हुए हिंदुओं के परिवारों को इंसाफ के सवाल पर न कभी भाजपा ने संसद से लेकर सड़क तक सवाल उठाया न कांग्रेस ने। क्या कश्मीर में आतंकवादियों की हिंसा के डर से घाटी छोडने को मजबूर हुए कश्मीरी पंडितों के पलायन की जिम्मेदारी लेने की अपेक्षा नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के नेताओं से की जा सकती है।
राजनीतिक दल और उनके नेता जिस दिन साफगोई से अपनी गल्तियां स्वीकार करने लगेंगे वह भारतीय राजनीति का आदर्श समय होगा,लेकिन एसी साफगोई की अपेक्षा सिर्फ एक दल या एक नेता से करना कहां तक उचित है। अब बात नोटबंदी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की तमाम योजनाओं और कार्यक्रमों में अगर सबसे ज्यादा कोई दो कदम हमेशा याद किए जाएंगे तो नोटबंदी और जीएसटी। नोटबंदी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर हर छोटे बड़े भाजपा नेता और नोटबंदी समर्थक अर्थशास्त्रियों ने इसे काले धन, भ्रष्टाचार, नकली नोटों के कारोबार और आतंकवाद के खिलाफ सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक कहा था। प्रधानमंत्री ने भी जनता से सिर्फ 50 दिन मांगे थे। लेकिन लगभग पौने दो साल बाद रिजर्व बैंक ने जो रिपोर्ट दी उसके मुताबिक नोटबंदी से जितनी भी भारतीय मुद्रा बाहर थी 99.30 फीसदी वापस बैंकों में जमा हो गई। इस रिपोर्ट ने विपक्ष को सरकार के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा दे दिया।
अपनी कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने से पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नोटबंदी को मोदी सरकार की गलती नहीं बल्कि छोटे व्यापारियों, लघु एवं मध्यम उद्यमियों, किसानों और महिलाओं पर एक आक्रमण की संज्ञा दे दी। राहुल ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा दिया कि उन्होंने अपने कुछ उद्योगपति मित्रों की मदद क लिए यह कदम उठाया। जिसका नुकसान देश की अर्थव्यवस्था से लेकर आम आदमी तक को उठाना पड़ा। हालाकि भाजपा ने बचाव में आंकड़े देकर बताया कि किस तरह करीब 18 लाख एसे खातों की छानबीन की जा रही है जिनमें नोटबंदी के बाद खासी रकम जमा की गई।
भाजपा ने टैक्स देने वालों का दायरा बढ़ने और ज्यादा राजस्व वसूली तथा लेनदेन के डिजीटलीकरण को नोटबंदी के फायदों के रूप में गिनाया। सरकार के बचाव में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार भी उतरे और उन्होंने अर्थव्यवस्था की सुस्ती का ठीकरा सीधे सीधे यूपीए सरकार और रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन पर फोड़ा। इससे एक बात तो साफ साबित होती है कि नोटबंदी को लेकर भाजपा और सरकार खासी असहज महसूस कर रही है। क्योंकि आने वाले विधानसभा चुनावों और फिर लोकसभा चुनावों में विपक्ष नोटबंदी को विफल बताते हुए इससे हुए नुकसान और लोगों की तकलीफ को सरकार के खिलाफ मुद्दा बनाएगा। इसलिए सरकार ने भी बचाव की पेशबंदी शुरु कर दी है। राफेल सौदे को लेकर सरकार पर विपक्ष खासा हमलावर है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा से पहले नोटबंदी को लेकर बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस के मौके का इस्तेमाल राहुल गांधी ने राफेल मुद्दे को उठाकर भी किया। इसके पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सिलसिलेवार तरीके से एक इंटरव्यू में राफेल को लेकर सरकार का पक्ष रखा और राहुल के आरोपों को बचकाना करार दिया। लेकिन जवाब में राहुल ने राफेल को लेकर बोफोर्स या टू जी की तर्ज पर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की गठित करके जांच कराने का दांव चल दिया।इसी बीच फ्रांस और भारत के एक अखबार में छपी राफेल सौदे के दौरान एक भारतीय उद्योग घराने जो इस सौदे को लेकर विपक्ष के निशाने पर है, ने फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति की मित्र की फिल्म की वित्तीय मदद करने की खबर को भी कांग्रेस ने हाथो हाथ उठा लिया।
भाजपा ने इसकी आंच महसूस करते हुए राहुल की कैलाश यात्रा पर ही सवाल खड़े करने शुरु कर दिए। यहां तक कि वह वाया चीन होकर क्यों कैलाश मानसरोवर जा रहे हैं इसे भी भाजपा ने मुद्दा बनाने की कोशिश की। यह अलग बात है कि कैलाश मानसरोवर ही उस तिब्बत में स्थित है जो अब चीन के अधिकार क्षेत्र में है। कुल मिलाकर दोनों पक्षों के बीच बयानों की गोलाबारी लगातार जारी रही। डॉलर के मुकाबले रुपए के लगातार गिरने और डॉलर की कीमत 71 रुपए से भी ज्यादा होने और दूसरी तरफ पेट्रोल डीजल की कीमतें रिकार्ड स्तर पर बढ़ने से भी देश में बेचैनी है।
हांलाकि अभी तक इन दोनों मुददों पर विपक्ष ने सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरकर कोई बड़ा आंदोलन नहीं शुरु किया है, लेकिन जिस तरह लोगों में इसे लेकर असंतोष बढ़ रहा है, उसे देखते हुए विपक्ष इस मुद्ददे को गरम करेगा इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। मध्य प्रदेश में एस सी एस टी एक्ट को लेकर अगड़ी जातियों का गुस्सा सड़कों पर दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की यात्रा हो या कांग्रेसी नेताओं का चुनाव प्रचार यह मुद्दा गरम है। अब अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा राजनीति में किस करवट बैठेगा अभी कुछ कहा नहीं जा सकता । लेकिन कांग्रेस इसे भुनाना चाहेगी, जबकि भाजपा अपने अगड़े जनाधार में इसे लेकर बचाव की मुद्रा में हैं। लेकिन अभी इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी ही होगी।