चीनी सैनिकों का धोखा सामने आता है तो होट स्प्रिंग के हीरो 'सोनम वांग्याल' का मन कड़वाहट से भर जाता है। भारतीय इलाके में घुसपैठ करने वाले चीन के सैनिकों ने हमारे जवानों को धोखे से मार डाला था। 'सोनम वांग्याल', सीआरपीएफ का जांबाज लद्दाखी हीरो। उन्होंने कई वर्ष पहले 'पुलिस स्मृति दिवस' को लेकर बातचीत की थी। वांग्याल ने 16000 फुट पर माइनस 40 डिग्री तापमान में चीनी सैनिकों के धोखे की कहानी बयां की थी। होट स्प्रिंग में कई फुट बर्फ पड़ी थी। मैं अकेला था। मेरे सामने दस जवानों के शव पड़े थे। शवों को लाने के लिए मैंने लकड़ी और तिरपाल का स्ट्रेचर बनाया। शवों को घोड़ों की मदद से खींचते हुए सिलुंग नाले के रास्ते होट स्प्रिंग (लेह में चीनी सैनिकों के कब्जे से मुक्त कराई गई भारतीय चौकी) तक लाया। शव इतने क्षत-विक्षत हो चुके थे कि उन्हें आगे ले जाना मुश्किल था। मैंने वहीं पर लकड़ियां एकत्रित की और अपने साथियों को सलामी देकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया।
कदम दर कदम चीन का धोखा ...
सोनम वांग्याल के मुताबिक, आप अतीत में जायें तो चीन के धोखे कदम दर कदम, देखने को मिल जाएंगे। हम शांति के पथ पर चलते हैं तो वह अपनी विस्तारवादी नीति को ही सब कुछ मानकर आगे कदम रखता है। पर्याप्त संसाधन न होते हुए भी हमारे जवान बहादुरी से लड़े थे। बता दें कि सोनम वांग्याल (80), सीआरपीएफ से रिटायर्ड और हॉट स्प्रिंग मिशन के एकमात्र जीवित लद्दाखी हीरो हैं। उन्होंने 1965 में मात्र 25 साल की आयु में एवरेस्ट फतह की थी। 2018 में नई दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में पीएम नरेंद्र मोदी ने पुलिस मेमोरियल का अनावरण करते वक्त सोनम वांग्याल को सम्मानित किया था। उन्हें खासतौर पर लेह से दिल्ली बुलाया गया था। वांग्याल ने बताया था, 1962 की लड़ाई से पहले 1959 में चीनी सैनिकों ने लेह-लद्दाख के कई इलाकों में बड़ी घुसपैठ की थी। 21 अक्तूबर 1959 के दिन 40 डिग्री से नीचे तापमान था। इस इलाके में चीनी सैनिकों ने बड़े पैमाने पर घुसपैठ की थी। इसके बावजूद गिनती के जवानों को हॉट स्प्रिंग पर चौकी स्थापित करने का आदेश दे दिया गया।
चौकी पर कब्जा करने के लिए दो टुकड़ी बनाई थी ...
बतौर सोनम, सितंबर 1959 में उनके दस्ते को हॉट स्प्रिंग, जिसके निकट चीनी फौज पहुंच चुकी थी, पर चौकी स्थापित करने का आदेश मिला था।इसके लिए 70 जवानों की दो टुकड़ी बनाई गई। एक का नेतृत्व आईटीबीएफ के डीएसपी करमसिंह और दूसरी टुकड़ी की कमान एसपी त्यागी को सौंपी गई थी। हमारे बहादुरों ने चौकी को चीनी कब्जे से मुक्त करा लिया। मेरे सहित दर्जनभर जवान पकड़े गए। कुछ दिन बाद मुझे और मेरे साथियों को चुशुल एयरपोर्ट के निकट रिहा कर दिया गया। जब हम बेस कैम्प पहुंचे तो मालूम हुआ कि आईटीबीएफ के डीएसपी करमसिंह की टुकड़ी के सात जवान, बेस कैंप पर नहीं पहुंचे। 20 अक्तूबर को डीएसपी कर्मसिंह के नेतृत्व में सोनम सहित करीब दो दर्जन जवान अपने लापता साथियों की तलाश में निकल पड़े। उन्हें रास्ते में चीनी सैनिकों और उनके घोड़ों के चिह्न दिखाई दिए। इससे पहले कि वे कोई रणनीति बनाते, एकाएक चीनी सैनिकों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। उन्होंने फायरिंग कर हमारे जवानों को धोखे से मार डाला। जो बच गए उन्हें हिरासत में ले लिया गया। सोनम बताते हैं कि हमारे जवान चीनी सैनिकों के साथ बहादुरी से लड़े थे। अनेक जवान शहीद हुए। उन्हीं शहीदों के सम्मान में हर वर्ष 21 अक्तूबर को देश में पुलिस संस्मरण दिवस मनाया जाता है।
चलता रहा हाथ में मिट्ठी उठाने का खेल ...
दूसरी ओर खड़ी चीन की फौज के सामने डीएसपी कर्मसिंह ने अपने हाथ में मिट्टी उठाकर कहा, यह जमीन हमारी है। आप यहां से वापस लौट जाओ।चीनी सैनिक वापस तो नहीं गए, लेकिन वे वैसा ही करने लगे, जैसा हमारे डीएसपी कर रहे थे। अगले दिन दोपहर तक यह खेल चलता रहा। चीनी सैनिक लड़ाई का बहाना तलाश रहे थे, जो उन्हें मिल भी गया। उन्होंने लड़ाई का बहाना एक पत्थर को बनाया। वह पत्थर, जिसे चीनी फौज के कमांडर ने हमारे ऊपर फेंका था। जब हमने इसका विरोध किया तो चीनी फौज ने हम पर चारों तरफ से फायरिंग शुरू कर दी। बर्फ में हमारे हथियार जवाब दे चुके थे। उस लड़ाई में हमारे 10 जवान शहीद हुए। डीएसपी करमसिंह सहित कई सिपाही चीनी सैनिकों की गिरफ्त में आ गए। सिपाही मक्खन लाल जो कि उस वक्त घायल हुआ था, आज तक वापस नहीं लौटा।चीन द्वारा बाकी जवानों को बाद में रिहा कर दिया गया, मगर उनमें मक्खन सिंह नहीं था। आज भी जब उसकी याद आती है तो आंखें भर आती हैं।सोनम बताते हैं, आज भी चीन पर भरोसा नहीं कर सकते हैं।
22 से 30 अक्तूबर के बीच कई कार्यक्रम ...
राष्ट्रीय पुलिस स्मारक पर 22 से 30 अक्तूबर के बीच कई कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इनमें शहीदों के परिजनों को स्मारक पर आमंत्रित करना, पुलिस बैंड डिस्पले, मोटर साईकल रैली, शहीदों के निमित्त दौड़ आदि का आयोजन करने के साथ-साथ पुलिस बल कर्मियों के बलिदान, शौर्य तथा सेवा को दर्शाने वाली फिल्में भी दिखाई जाती हैं। इस अवधि के दौरान सभी पुलिस बलों द्वारा देश भर में इसी प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह स्मारक पुलिस बलों में राष्ट्रीय पहचान, गर्व, उद्देश्यों में एकरूपता, एक समान इतिहास और भविष्य की भावना भरने के साथ-साथ उनकी इस प्रतिबद्धता को भी और मजबूत करता है कि उन्हें अपने प्राणों की कीमत पर भी देश की रक्षा करनी है। पुलिस स्मारक में एक केंद्रीय शिल्पकृति के अलावा 'शौर्य की दीवार' तथा एक संग्रहालय भी मौजूद है। केंद्रीय शिल्पकृति के रूप में मौजूद एक 30 फुट ऊंचा ग्रेनाइट का एकल पाषाण खंड, पुलिस कर्मियों की शक्ति, विनम्रता और नि:स्वार्थ सेवा का प्रतीक है। 'शौर्य की दीवार' पर शहीदों के नाम उत्कीर्ण हैं।