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पुलवामा हमले का बदला पूरा, भारतीय सेना ने ट्वीट की ये कविता

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Shilpa Thakur Updated Tue, 26 Feb 2019 10:27 AM IST
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indian army - फोटो : social media

भारत ने मंगलवार को पुलवामा आतंकी हमले का बदला पाकिस्तान से ले लिया है। आज सुबह भारतीय वायुसेना ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर आतंकी कैंप को ध्वस्त कर दिया। 

सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि वायुसेना के विमान ने आतंकी कैंप पर एक हजार किलोग्राम के बम गिराए। जिसमें आतंकी कैंप पूरी तरह से ध्वस्त हो गए। हालांकि भारतीय वायु सेना, भारतीय सेना या फिर भारत सरकार की ओर से इस बात की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। लेकिन भारतीय सेना द्वारा एक कविता ट्वीट की गई है, जिससे इस जवाबी हमले की ओर इशारा किया जा रहा है। 



ये है भारतीय सेना द्वारा ट्वीट की गई कविता की कुछ पंक्तियां-

'क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुए विनीत जितना ही,
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की,
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की।'
 
 

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indian army - फोटो : social media
भारत ने मंगलवार को पुलवामा आतंकी हमले का बदला पाकिस्तान से ले लिया है। आज सुबह भारतीय वायुसेना ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर आतंकी कैंप को ध्वस्त कर दिया। 

सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि वायुसेना के विमान ने आतंकी कैंप पर एक हजार किलोग्राम के बम गिराए। जिसमें आतंकी कैंप पूरी तरह से ध्वस्त हो गए। हालांकि भारतीय वायु सेना, भारतीय सेना या फिर भारत सरकार की ओर से इस बात की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। लेकिन भारतीय सेना द्वारा एक कविता ट्वीट की गई है, जिससे इस जवाबी हमले की ओर इशारा किया जा रहा है। 

ये है भारतीय सेना द्वारा ट्वीट की गई कविता की कुछ पंक्तियां-

'क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुए विनीत जितना ही,
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की,
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की।'
 
 

ये है पूरी कविता-

ये भारतीय लेखक, कवि एवं निबन्धकार रामधारी सिंह दिनकर की कविता है। भारतीय सेना रोज ऐसी ही अद्भुत कविताओं को ट्वीट करती है। 

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहां, कब हारा?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।
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