सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और सीबीआई के नंबर दो, विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच छिड़े घमासान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों को तलब किया है। लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सीबीआई के भीतर छिड़े घमासान से गिर रही जांच एजेंसी की साख बचा पाएंगे? सीबीआई में ऐसा पहली बार हो रहा है जब विशेष निदेशक के सहायक और डिप्टी डायरेक्टर देवेन्द्र के आवास पर छापेमारी की कार्रवाई के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह भी पहला मामला है जब प्रधानमंत्री ने खुद हस्तक्षेप किया और प्रधानमंत्री कार्यालय ने राकेश अस्थाना पर सीबीआई निदेशक वर्मा द्वारा दर्ज एफआईआर के बाद भी उन्हें गिरफ्तार न किए जाने का निर्देश दिया है।
सूत्र बताते हैं कि सीबीआई के शीर्ष पद पर बैठे लोगों के बीच छिड़े घमासान से न केवल जांच एजेंसी बल्कि केंद्र सरकार की साख पर बट्टा लग रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह पूरे मामले से दुखी और असहाय हैं। बताते हैं स्थिति को नियंत्रण से बाहर जाते देखकर प्रधानमंत्री ने दोनों शीर्ष अधिकारियों को तलब किया है।
क्या है तकनीकी पेंच
सीबीआई के दोनों शीर्ष अधिकारियों ने एक दूसरे के खिलाफ कब्र खोदने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आलोक वर्मा ने जहां मांस कारोबारी मोइन कुरैशी के मामले में उसे क्लीन चिट दिलाने के लिए अस्थाना द्वारा घूस लेने के आरोप का आधार मोइन कुरैशी का मध्यस्थ सतीश साना को बनाया है। वहीं अस्थाना ने सीबीआई निदेशक पर भी घूस लेने का आरोप लगाया है। सीबीआई के अनुसार सतीश साना से मनोज प्रसाद ने पैसे मांगे थे। सतीश ने मोइन कुरैशी को क्लीन चिट दिलाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई था।
साना ने सीबीआई को बताया कि दुबई में इनवेस्टमेंट बैंकर के रूप में काम करने वाले मनोज ने मोइन को क्लीन चिट दिलाने के लिए उससे पांच करोड़ रुपये मांगे थे। मनोज का भाई सोमेश सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के पैसों के निवेश का कामकाज देखता है। इस तरह से मनी रूट बना और पैसों का लेन-देन हुआ। दिसंबर 2017 से अक्टूबर 2018 तक पांच बार धन का लेन-देन हुआ और 16 अक्तूबर को मनोज प्रसाद अपनी गिरफ्तारी से पहले इसी कड़ी में किश्त वसूलने के लिए भारत आया था। बताते हैं पैसे के लेनदेन में अस्थाना के सहायक और डिप्टी एसपी देवेन्द्र ने भी भूमिका निभाई थी। लिहाजा सीबीआई ने 22 अक्तूबर को देवेन्द्र को भी गिरफ्तार कर लिया।
मनोज के गिरफ्तार होने के बाद
मनोज प्रसाद के गिरफ्तार के होने के बाद सीबीआई सूत्रों का कहना है कि विशेष निदेशक राकेश अस्थाना सक्रिय हो गए। उन्होंने 17 अक्तूबर को सीबीआई के कई वरिष्ठ अफसरों को कई फोन काल्स और व्हाट्सएप मैसेज किए। बताते हैं राकेश अस्थाना के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी में ये सभी रिकॉर्ड दर्ज हैं। दूसरी तरफ सीबीआई निदेशक की तरह से एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच ऐजेंसी के विदेश निदेशक ने अपने वरिष्ठ और सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर दो करोड़ रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगाया। चूंकि सीबीआई के विशेष निदेशक नियमत: अपने वरिष्ठ पर प्राथमिकी दर्ज होने का आदेश नहीं दे सकते थे, इसलिए उन्होंने 24 अगस्त 2018 को वर्मा के खिलाफ दो करोड़ रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगाते हुए एक पत्र कैबिनेट सेक्रेटरी, प्रधानमंत्री कार्यालय को लिख दिया। अस्थाना इससे पहले सीवीसी को भी पत्र लिख चुके हैं।
प्रधानमंत्री के लिए बड़ी चुनौती
सीबीआई निदेशक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच लड़ाई काफी समय से चल रही है। इसको लेकर सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा कई बार प्रधानमंत्री कार्यालय को अवगत करा चुके हैं। हालांकि राकेश अस्थाना के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने से पहले वर्मा के लिए अनुमति लेने की अनिवार्य शर्त है। उन्होंने इसका पालन नहीं किया। वहीं माना जाता है कि सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को प्रधानमंत्री कार्यालय का स्नेह प्राप्त है। अस्थाना ने भी लगातार अपनी लक्ष्मण रेखा लांघी है। खास बात यह है कि दोनों ही वरिष्ठ अफसर अपने कार्यकाल के आखिरी सोपान पर हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी के लिए जांच एजेंसी की छीछालेदर होने से बचा पाना काफी बड़ी चुनौती है।