साल 2013 में आई बाढ़ के बाद उत्तराखंड की पनबिजली परियोजनाओं पर रोक लगा दी गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट राज्य पर लगी इस रोक को हटाने के लिए सुनवाई करने को तैयार हो गया है। जिसके बाद प्रधानमंत्री के कार्यालय ने अधिकारियों को सम्मन देते हुए इस बैन को बनाए रखने के समर्थन में अधिकारियों से उनकी रिपोर्ट मांगी है। साल 2016 में पर्यावरण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मदन मोहन मालवीय और औपनिवेशिक काल के दौरान साल 1916 में हुए समझौते के अनुसार गंगा और उसकी सहयोगी नदियों के द्वारा राज्य में कम से कम 1,000 क्यूसेक पानी छोड़े जाने वाली नदियों पर पनबिजली परियोजना लगाई जा सकती है।
हालांकि
उमा भारती जो उस समय गंगा पुनरुद्धार मंत्री थीं उन्होंने पर्यावरण मंत्रालय में अपने सहयोगी को पत्र लिखकर ताज्जुब जाहिर करते हुए कहा कि मंत्रालय ने कोर्ट में जो दस्तावेज जमा करवाए उसके अनुसार आम सहमति बनी थी, जबकि ऐसा नहीं था। जिसके बाद साल 2016 में गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय ने अपना अलग हलफनामा कोर्ट में जमा करवाया, जिसमें पनबिजली परियोजना का विरोध किया गया। वहीं ऊर्जा मंत्रालय ने पहले पर्यावरण मंत्रालय का समर्थन किया था। तब से यह मामला चला आ रहा है।
पिछले साल सितंबर में नितिन गडकरी को उमा भारती के गंगा पुनरुद्धार और जल संसाधन मंत्रालय का कार्यभार सौंप दिया गया था। जिसके बाद 23 जनवरी को नीति आयोग के अध्यक्ष राजीव कुमार ने सभी मंत्रालयों और राज्य के अधिकारियों संग उत्तराखंड पर लगे बैन पर एक बैठक की। जिसके बाद इसी साल 3 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट 19 से 23 फरवरी के बीच इस मामले पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गुरुवार को प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा एक बैठक की अध्यक्षता करेंगे जिसमें सभी से उनके मतभेद दूर करने के लिए कहा जाएगा।