प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को युवाओं को खिलौनों के साथ एप और कंप्यूटर गेम बनाने का आह्वान करते हुए कहा, दुनिया भर में खिलौने का कारोबार सात लाख करोड़ रुपये से अधिक का है। मगर, इस कारोबार में भारत का हिस्सा बहुत कम है।
जिस राष्ट्र के पास इतनी विरासत, परंपरा, विविधता और युवा आबादी हो, क्या खिलौनों के बाजार में उसकी हिस्सेदारी इतनी कम होनी चाहिए। हमने इस बात पर मंथन किया कि भारत के बच्चों को नए-नए खिलौने कैसे मिलें। भारत खिलौना उत्पादन में बहुत बड़ा हब कैसे बने?
मन की बात 2.0 के 15वें संस्करण में पीएम ने खिलौने, मोबाइल एप और कंप्यूटर गेम के बाजार में चीन के दबदबे को देखते हुए लघु और बडे़ उद्योगों के साथ-साथ स्टार्ट अप उद्यमियों से अपील करते हुए कहा कहा, आइए मिलकर खिलौने बनाएं। अब सभी के लिए लोकल खिलौनों के लिए वोकल होने का समय आ गया है।
पीएम ने कहा, कोरोना के कालखंड में मन में ये सवाल आता रहा कि इतने लंबे समय तक घरों में रहने के कारण मेरे छोटे-छोटे बाल-मित्रों का समय कैसे बीतता होगा? हमारे चिंतन का विषय था- खिलौने और विशेषकर भारतीय खिलौने। खिलौने जहां गतिविधि को बढ़ाने वाले होते हैं, हमारी आकांक्षाओं को भी उड़ान देते हैं। खिलौने केवल मन ही नहीं बहलाते, मन भी बनाते हैं और मकसद गढ़ते भी हैं।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि सबसे अच्छा खिलौना वह होता है जो अधूरा हो। बच्चे मिलकर खेल-खेल में उसे पूरा करें। प्रधानमंत्री ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि करीब सौ साल पहले असहयोग आंदोलन के जरिये आत्मनिर्भर भारत निर्माण का बीज बोया गया था। अब इसे वट वृक्ष के रूप में परिवर्तित करना सबका दायित्व है।
बचपन खिले और खिलखिलाए भी
पीएम ने कहा, खिलौना पर्यावरण अनुकूल हो। ऐसा खिलौना जिसकी मौजूदगी में बचपन खिले भी, खिलखिलाए भी। हम ऐसे खिलौने बनाएंजो पर्यावरण के अनुकूल हो। खिलौने एक्टिविटी बढ़ाने वाले और हमारी आकांक्षाओं को उड़ान देने वाले होते हैं। बच्चों के जीवन के अलग-अलग पहलू पर खिलौनों का व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी इस पर व्यापक ध्यान दिया गया है।