प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार-रविवार को गुजरात के दो दिवसीय दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वे कई महत्त्वपूर्ण योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण करेंगे। पीएम की लगातार हो रही गुजरात यात्राओं को उनके गृहराज्य में पार्टी को मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। लगभग 24 साल से गुजरात की सत्ता में बैठी भाजपा के लिए यह चुनाव कई मायनों में महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। अक्तूबर-नवंबर में होने वाले राज्य के विधानसभा चुनाव के परिणाम केवल राज्य तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इसका असर अगले वर्ष नौ राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2024 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि भाजपा यहां एक बार फिर मजबूती से अपनी वापसी की रणनीति बनाने में जुटी है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि पीएम का किला कितना सुरक्षित है? भाजपा के सामने राज्य में क्या चुनौतियां हैं?
भाजपा राज्य में 1998 से लगातार सत्ता में है। उस समय उसके केशूभाई पटेल ने पार्टी की कमान संभाली थी। तब से अब तक उसके पांच मुख्यमंत्रियों (नरेंद्र मोदी, आनंदीबेन पटेल, विजय रूपाणी और वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल) ने राज्य का प्रतिनिधित्व किया है। इसमें वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी ने राज्य का लगभग 12 वर्ष तक प्रतिनिधित्व किया। नरेंद्र मोदी के राज्य की सत्ता संभालने के बाद से अब तक वह राज्य में उन्हीं के नाम पर सत्ता में लौटती रही है।
माना जाता है कि भाजपा ने राज्य में पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता के बीच खराब छवि को सुधारने के लिए ही आनंदीबेन पटेल को हटाकर विजय रूपाणी को मुख्यमंत्री बनाया था और लेकिन उनकी कार्यशैली से भी बात न बनने पर भूपेंद्र पटेल को राज्य की कमान सौंपी गई। हालांकि, इसके बाद भी लंबे समय से सत्ता में बने रहने से शासन-प्रशासन में आई एकरसता दूर नहीं हो सकी है। इस एकरसता को तोड़ना और भाजपा कार्यकर्ताओं में नया जोश भरना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
भाजपा के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि पार्टी गुजरात में अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है। लेकिन वह केवल जीत से संतुष्ट नहीं है। वह पिछले गुजरात चुनाव की स्थिति दोबारा पैदा होने नहीं देना चाहती जहां पार्टी 99 सीटों की संख्या पर सिमट गई थी और बेहद मामूली अंतर से जीत पाई थी। राज्य में आम आदमी पार्टी के उभार से पहले वह इस बार 150 सीटों का आंकड़ा भी पार कर एक रिकॉर्ड बनाने की बात सोच रही थी। इसमें पीएम नरेंद्र मोदी की छवि उसकी सबसे बड़ी सियासी ताकत बनी हुई है।
इसके लिए एक-एक सीट पर जातिगत और अन्य समीकरणों का ध्यान रखकर पार्टी मंथन कर रही है। इसके लिए पार्टी की एक मशीनरी लगी हुई है और हर सीट पर सर्वे कराए जा रहे हैं। 2021 के अंत तक पार्टी अपने सर्वे में 150 का आंकड़ा आसानी से पार करती नजर आ रही थी।
हालांकि, अब जैसे-जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं, राज्य की चुनावी परिस्थितियां भी तेजी से बदल रही हैं। सूरत नगर निगम चुनाव में 118 सीटों में से 27 सीटों पर जीत हासिल कर चुकी आम आदमी पार्टी की उम्मीदें उफान पर हैं। केजरीवाल की मुफ्त की राजनीति गरीब, मध्यम वर्ग के लोगों को आकर्षित कर रही है। वह इस चुनाव में दिल्ली-पंजाब की तरह बहुत बड़ी सफलता हासिल करने की उम्मीद नहीं कर सकती, लेकिन वह कुछ सीटें हासिल करने में सफल रहेगी, तो शहरी क्षेत्रों से लेकर आदिवासी और ग्रामीण इलाकों तक में अच्छी संख्या में वोट हासिल कर सकती है।
भाजपा कांग्रेस में चल रही गतिविधियों पर भी पूरी तरह नजरें गड़ाए हुए है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस गुजरात में कमजोर पड़ती है तो इसका लाभ आम आदमी पार्टी को जा सकता है। गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा जैसे नेताओं का पार्टी से टूटना कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर असर डालने वाला है और इसका नकारात्मक असर गुजरात में भी पड़ सकता है।
राहुल गांधी ने 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में जमकर प्रचार किया था और एक समय यहां तक माना जा रहा था कि कांग्रेस चुनाव जीत सकती है। हालांकि, अंतिम समय में पीएम मोदी ने गुजरात में तीन दिनों का कैंप करके पूरा चुनावी गणित बदल दिया और वे भाजपा को अपने गृहराज्य में दोबारा जिताने में कामयाब हो गए थे, लेकिन यदि उनके ऊपर इसी तरह हमले होते रहे तो इसका नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।
गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार युजवेंद्र दुबे ने अमर उजाला को बताया कि गुजरात का यह वोट बैंक भाजपा और कांग्रेस के बीच बंट जाता था। कांग्रेस की मुस्लिम हितैषी छवि होने के कारण उसे एक वर्ग का वोट नहीं मिलता था, जबकि भाजपा इस मामले में ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़ लेती थी, जिससे उसकी जीत सुनिश्चित हो जाती थी। नरेंद्र मोदी की गुजरात अस्मिता से जुड़ी छवि भाजपा की जीत को तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।
लेकिन आम आदमी पार्टी पर मुस्लिम हितैषी होने का टैग चस्पा नहीं हो पाया है। अपनी हिंदू छवि को बचाए रखने के लिए अरविंद केजरीवाल लगातार प्रयास करते रहते हैं और उन्हें इसका लाभ भी मिल रहा है। यही कारण है कि गुजरात में भाजपा की चुनावी तैयारियों के केंद्र में कांग्रेस की जगह आम आदमी पार्टी ने ले लिया है।