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PM मोदी की 29 रैली, 621 बार राहुल का जिक्र, गुजरात मॉडल गए भूल!

Sun, 10 Dec 2017 04:43 PM IST
पी चिदंबरम
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- फोटो : ani
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सोशल मीडिया के एक टिप्पणीकार ने दावा किया है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 29 रैलियों में दिए गए भाषणों का विश्लेषण किया, तो पाया कि उनमें राहुल गांधी का जिक्र 621 बार आया, कांग्रेस का जिक्र 427 बार आया और उन्होंने एक बार भी गुजरात मॉडल का जिक्र नहीं किया! यह अतिशयोक्ति हो सकती है या फिर गिनती में कुछ गलती हो सकती है, लेकिन यह गुजरात में भाजपा के प्रचार अभियान के एक महत्वपूर्ण पहलू को रेखांकित करता है, अभियान विकास या अच्छे दिन पर केंद्रित नहीं हैं। 
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यह कांग्रेस शासन के कथित बुरे दिनों पर केंद्रित है। इससे पहले किसी को सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से ऐसे नकारात्मक प्रचार की याद नहीं होगी। कांग्रेस 1995 से गुजरात में सत्ता में नहीं है। 

केंद्र में कांग्रेस शासन का कार्यकाल मई, 2014 में समाप्त हो गया था। गुजरात के चुनाव राहुल गांधी या कांग्रेस पार्टी के बारे में नहीं हैं, बल्कि ये इस पर हैं कि 1995 से भाजपा की सरकारों ने गुजरात के लोगों को क्या दिया। यह गुजरात के लोगों की आज की जरूरतों, चिंताओं और उनके भय के बारे में हैं।
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मूल्यवृद्धि और विकास
उपलब्ध रिपोर्ट्स और प्रमाण यह संकेत करते हैं कि गुजरात के मतदाताओं के मन में जो चार मुद्दे प्रमुख हैं, वे हैं मूल्यवृद्धि (18 फीसदी), विकास (13 फीसदी), बेरोजगारी (11 फीसदी) और गरीबी (11 फीसदी)। 

सत्तारूढ़ दल की ओर से कोई भी मूल्यवृद्धि के बारे में नहीं बोलेगा। इस मुद्दे के समाधान की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक पर छोड़ दी गई है और पांच दिसंबर को रिजर्व बैंक ने क्या कहाः 'आने वाले समय में मुद्रास्फीति तेज रह सकती है... अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम में हाल में आई तेजी जारी रह सकती है...भू-राजनीतिक घटनाक्रम के कारण पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव आगे भी दाम में वृद्धि कर सकता है। 

'केंद्र सरकार ने तीन वर्षों तक कच्चे तेल के दाम में गिरावट का फायदा उठाया, मगर उसने उपभोक्ताओं को कुछ राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम में कमी करने से इंकार कर दिया। इसके लिए मांग भी की गई, इसका एक सरल समाधान भी था, लेकिन वित्तीय स्थिति का हवाला देकर सरकार जड़वत बनी रही। इसका एक स्वाभाविक समाधान है कि पेट्रोलियम उत्पादों को भी जीएसटी के दायरे में लाया जाए। यदि मैं गुजरात का मतदाता होता, तो मैं उस पार्टी को वोट देता, जो पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने और तुरंत प्रभाव से पेट्रोल और डीजल के दामों में प्रति लीटर दस रुपये की कटौती करने का वायदा करती।

सत्तारूढ़ दल का कोई भी व्यक्ति विकास के बारे में नहीं बोलेगा और यदि वह बोलेगा भी, तो यह बुलेट ट्रेन के बारे में होगा, जिसमें 90 फीसदी लोग कभी सफर ही नहीं करेंगे। या फिर यह सरदार सरोवर के बारे में होगा, जिसका पानी सौराष्ट्र और पानी की तंगी वाले अन्य जिलों तक नहीं पहुंच सकता, क्योंकि पिछले 22 वर्षों में 30,000 किलोमीटर लंबी नहरों के निर्माण का काम पूरा नहीं हुआ है। इसलिए हैरत नहीं होनी चाहिए कि गुजरात के लोग कह रहे हैं कि विकास गांडो थयो छे (विकास पागल हो गया है)। 

यदि मैं गुजरात का मतदाता होता, तो मैं उस पार्टी को वोट देता, जिसने सरदार सरोवर की नहरों का जल्द निर्माण, हाई वे का निर्माण और हर मौसम में काम आने वाली सड़कों के निर्माण के साथ ही शहरों की सड़कों की मरम्मत करने और हर क्षेत्र में हवाई अड्डों का निर्माण करने का वायदा करे।
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बेरोजगारी और गरीबी

भाजपा से कोई भी बेरोजगारी के बारे में नहीं बोलेगा। भाजपा रोजगार केंद्रों में पंजीबद्ध लोगों की संख्या में कमी की बात करेगी। यह आत्मघाती कदम है। वहां व्यापक बेरोजगारी है और किसी को यह उम्मीद नहीं है कि रोजगार कार्यालय में नाम दर्ज करवाने से रोजगार मिल ही जाएगा। और हकीकत यह है कि हजारों लोगों ने नोटबंदी और त्रुटिपूर्ण जीएसटी के कारण छोटे तथा मंझोले उद्योगों को लगे झटके की वजह से (गुजरात और अन्य जगह) नौकरियां या रोजगार गंवा दिए। 

यह समझना कठिन नहीं है कि आखिर क्यों हजारों युवा गुजरात के साहसी युवा नेताओं के साथ आ रहे हैं। यदि मैं गुजरात का मतदाता होता, तो मैं ऐसी पार्टी को वोट देता जो सरकार के हजारों रिक्त पदों पर भर्ती करे (और उचित वेतन देगी, न कि एक मुश्त राशि) और एसएमई (लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योग) को प्रोत्साहन देगी, ताकि रोजगार बढ़ सके।

गुजरात में भाजपा की सरकार ने अपनी पीठ गरीबों की ओर कर दी है। मानव विकास सूचकांक के हताशाजनक संकेतकों या फिर बाल स्वास्थ्य, साक्षरता, लैंगिक अनुपात और सामाजिक क्षेत्र में प्रति व्यक्ति खर्च के मामले में गुजरात की फिसड्डी रैंकिंग से बेहतर भला और कैसे यह स्पष्ट हो सकता है। यदि मैं गुजरात का मतदाता होता, तो मैं उस पार्टी को वोट देता, जो गरीबों और मध्य वर्ग के प्रति समानुभूति रखे और धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव किए बिना उनकी वास्तविक समस्याओं को दूर करने के लिए संसाधान और समय दे।

चुनाव और जवाबदेही
मैं यह निःसंकोच स्वीकार करता हूं कि विकास, रोजगार और मूल्यवृद्धि से जुड़े मुद्दे सभी राज्यों से संबंधित हैं। अतीत में भी सत्तारूढञ दलों ने वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने के प्रयास किए थे, लेकिन समझदार मतदाताओं ने सरकार बदल दी और हर चुनाव के साथ ही मतदाता अधिक समझदार होते जा रहे हैं। यह बहस तेज हो रही है कि भाजपा हिंदुत्व, अयोध्या, पर्सनल लॉ, गोरक्षा, अंधराष्ट्रवाद और समाज की कमजोरियों से जुड़े मुद्दों को हवा देना चाहती है। प्रधानमंत्री अपने भाषणों में ऐसे मुद्दे उठाएंगे और ऐसी टिप्पणी करेंगे जो उस दिन की सुर्खी होगी। 

मीडिया उस पर उग्र बहस करेगा। यह अच्छा है कि कोई और पार्टी इस झांसे में नहीं आई। वे विकास के साथ ही रोजगार और मूल्यवृद्धि जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित रखे हुए हैं। कोई भी यह नहीं कह सकता कि चुनाव के नतीजे क्या होंगे। बिहार में सर्वे के उलट नतीजे आए, उत्तर प्रदेश के नतीजे ओपिनियन पोल से उलट थे। हम सिर्फ यही उम्मीद कर सकते हैं कि गुजरात के हित में, केंद्र में अगले 16 महीने बेहतर शासन के हित में गुजरात के मतदाता यह याद रखेंगे कि चुनाव का समय जवाबदेही तय करने का होता है।

अमर उजाला संपादकीय पेज से साभार
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