उच्चतम न्यायालय देश में कोरोना महामारी से निबटने में कथित कुप्रबंधन की जांच के लिए जांच आयोग कानून के तहत आयोग गठित करने के लिए दायर जनहित याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करेगा।याचिका में केंद्र को शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्र समय रहते कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार को सीमिति करने के उपाय करने में विफल रहा है। याचिका में कहा गया है कि सरकार की खामियों का पता लगाने के लिए जरूरी है कि किसी स्वतंत्र आयोग से इसकी जांच करायी जाए। शीर्ष अदालत की कार्यसूची के अनुसार न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष 14 अगस्त को सेवानिवृत्त नौकरशाहों सहित छह याचिकाकर्ताओं की याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।
याचिका में दावा किया गया है कि महामारी से निबटने में केन्द्र की कार्यवाही और नागरिकों की जिंदगी तथा आजीविका पर इसका बुरा प्रभाव निश्चित ही लोक महत्व का मामला है और इसके लिये जांच आयोग कानून की धारा तीन के तहत आयोग गठित करने की जरूरत है। याचिका में कहा गया है कि 24 मार्च को कोविड-19 के मद्देनजर देशव्यापी लॉकडाउन लागू करने की सरकार की घोषणा मनमानीपूर्ण, अतार्किक और राज्य सरकारों तथा विशेषज्ञों से किसी सलाह मशविरे के बगैर ही उठाया गया कदम था।
याचिका में दावा किया गया है कि 25 मार्च से देश व्यापी लॉकडाउन और इसे लागू करने के तरीके का नागरिकों के रोजगार, आजीविका और देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा। याचिका के अनुसार भारत में लागू लॉकडाउन दुनिया में सबसे ज्यादा कठोर और प्रतिबंधों वाला था, लेकिन इसके बावजूद यह कोविड-19 महामारी के प्रसार को रोकने में विफल रहा। याचिका में लाकडाउन की वजह से बड़े शहरों से अपने पैतृक स्थानों के लिए बड़े पैमाने पर कामगारों और दिहाड़ी मजदूरों के पलायन का जिक्र भी किया गया है।
याचिका के अनुसार प्राधिकार आपदा प्रबंधन कानून, 2005 के तहत समाज के कमजोर तबके को न्यूनतम राहत प्रदान करने के लिये राष्ट्रीय योजना और दिशानिर्देश तैयार करने में विफल रहे है। याचिका में दावा किया गया है कि महामारी के दौरान उपचार और बचाव के काम में जुटे लोगों को समय से पर्याप्त संख्या में सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति में भी विलंब हुआ।