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प्लास्टिक बना अदृश्य खतरा: सतह पर पनपते वायरस बढ़ा रहे रोगाणुरोधी प्रतिरोध, एंटीबायोटिक दवाओं को कर रहा बेअसर

Mon, 05 Jan 2026 04:52 AM IST
शुभम कुमार अमर उजाला नेटवर्क

सार

प्लास्टिक प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्लास्टिक की सतह पर बनने वाली ‘प्लास्टिस्फियर’ परत में वायरस और बैक्टीरिया ऐसे जीन फैलाते हैं जो रोगाणुरोधी प्रतिरोध बढ़ाते हैं। इससे एंटीबायोटिक दवाएं भविष्य में बेअसर हो सकती हैं, जो आधुनिक चिकित्सा के लिए गंभीर चेतावनी है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Google Gemini
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अब तक प्लास्टिक प्रदूषण को नदियों, समुद्रों और जमीन तक सीमित संकट माना जाता रहा है, लेकिन ताजा वैज्ञानिक शोध चेतावनी दे रहे हैं कि यह समस्या हमारी सेहत और आधुनिक चिकित्सा की बुनियाद एंटीबायोटिक दवाओं को भी कमजोर कर रही है। वैज्ञानिकों के मुताबिक प्लास्टिक की सतह पर पनपने वाले वायरस, बैक्टीरिया के बीच ऐसे जीन पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं, जो रोगाणुरोधी प्रतिरोध को बढ़ाते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि जिन दवाओं पर आज संक्रमण से लड़ने के लिए भरोसा किया जाता है, वे भविष्य में बेअसर हो सकती हैं।

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वैज्ञानिक बताते हैं कि जब प्लास्टिक कचरा प्राकृतिक पर्यावरण नदियों, झीलों, समुद्रों या मिट्टी में पहुंचता है तो उसकी सतह पर बहुत जल्दी बैक्टीरिया, फंगस और अन्य सूक्ष्मजीवों की एक परत जम जाती है। इस जीवित परत को ‘प्लास्टिस्फियर’ कहा जाता है। पहले के अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि प्लास्टिस्फियर में रोगाणुरोधी प्रतिरोध से जुड़े जीन सामान्य पर्यावरण की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में मौजूद होते हैं।

सूक्ष्म दुनिया में मौजूद वायरस की भूमिका का केंद्र
अब तक वैज्ञानिकों का ध्यान मुख्य रूप से यहां रहने वाले बैक्टीरिया पर था, लेकिन नई रिसर्च ने इस सूक्ष्म दुनिया में मौजूद वायरस की भूमिका को केंद्र में ला दिया है। जर्नल बायोकंटैमिनेंट में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार वायरस, जो पृथ्वी पर सबसे अधिक संख्या में पाए जाने वाले जैविक तत्व हैं, इन प्रतिरोधी जीनों को एक सूक्ष्मजीव से दूसरे तक पहुंचाने के प्रभावी वाहक बन सकते हैं। इस खोज ने प्लास्टिक प्रदूषण को एक नए, अदृश्य जैविक खतरे के रूप में चिन्हित किया है।
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अध्ययन में इन बातों पर दिया गया जोर
अध्ययन में बताया गया है कि वायरस बैक्टीरिया के बीच जीनों के आदान-प्रदान को संभव बनाते हैं। इस प्रक्रिया को ‘हॉरिजॉन्टल जीन ट्रांसफर’ कहा जाता है। शोध में सामने आया है कि कुछ वायरस ऐसे अतिरिक्त जीन अपने साथ रखते हैं, जो कठिन परिस्थितियों जैसे एंटीबायोटिक दवाओं या रासायनिक प्रदूषकों के दबाव में बैक्टीरिया को जीवित रहने में मदद करते हैं। नतीजतन दवा-रोधी बैक्टीरिया को बढ़त मिलती है और वे तेजी से फैल सकते हैं।

वायरस फैलाने के शक्तिशाली चालक
चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज से जुड़े और इस अध्ययन के प्रमुख वैज्ञानिक डोंग झू का कहना है कि अब तक अधिकतर शोध प्लास्टिस्फियर में मौजूद बैक्टीरिया तक सीमित थे, जबकि वायरस हर जगह मौजूद हैं और अपने होस्ट से गहराई से जुड़े रहते हैं। उनके अनुसार यह अध्ययन संकेत देता है कि वायरस रोगाणुरोधी प्रतिरोध फैलाने के छिपे हुए लेकिन शक्तिशाली चालक हो सकते हैं। इसी दिशा में बोस्टन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में आने वाले बैक्टीरिया कई आम एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो गए। ये वही दवाएं हैं, जिनका इस्तेमाल संक्रमणों के इलाज में व्यापक रूप से किया जाता है।

प्लास्टिक, वायरस और हमारी बेबस दवाएं
जर्नल ऑफ हैजर्डस मैटेरियल्स लेटर्स में प्रकाशित एक और अध्ययन के मुताबिक माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी बैक्टीरिया में रोगाणुरोधी प्रतिरोध को 30 गुना तक बढ़ा सकती है। शोध से यह भी स्पष्ट हुआ है कि माइक्रोप्लास्टिक न केवल बैक्टीरिया और अन्य रोगजनकों को एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स विकसित करने में मदद करते हैं, बल्कि उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का माध्यम भी बन जाते हैं। इससे जलीय जीवों के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस विषय पर और गहन अध्ययन की आवश्यकता है। ताकि यह समझा जा सके कि प्लास्टिक की सतह पर वायरस और बैक्टीरिया जीनों का आदान-प्रदान किन परिस्थितियों में और कितनी तेजी से करते हैं। साथ ही, वायरस में मौजूद रोगाणुरोधी जीनों की पहचान के लिए आसान, तेज और भरोसेमंद तकनीकों के विकास पर भी जोर दिया गया है।

कैसे किया जा सकता है कम, क्या कहा शोधकर्ताओं ने?
शोधकर्ताओं के अनुसार यदि प्लास्टिक कचरे की निगरानी और प्रबंधन को बेहतर बनाया जाए, तो रोगाणुरोधी प्रतिरोध के इस उभरते खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कुल मिलाकर, प्लास्टिक प्रदूषण अब सिर्फ आंखों से दिखने वाला संकट नहीं रह गया है। यह हमारी जीवनरक्षक दवाओं को बेअसर करने वाला एक गहराता हुआ अदृश्य जैविक खतरा बन चुका है, जिसे समय रहते काबू करना बेहद जरूरी है।
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